जनपद में कुल 21 परीक्षा केन्द्रो पर दो पालियों में आयोजित की गयी परीक्षा
जिलाधिकारी ने सकुशल व नकल विहीन परीक्षा सम्पन्न कराने के दृष्टिगत कई परीक्षा केन्द्रो का किया निरीक्षण
मीरजापुर 17 फरवरी 2024- उत्तर प्रदेश पुलिस आरक्षी नागरिक पुलिस भर्ती परीक्षा-2024 जनपद में सकुशल व शान्तिपूर्ण सम्पन्न कराया गया। शान्तिपूर्ण व नकल विहीन परीक्षा सम्पन्न कराने के दृष्टिगत जिलाधिकारी प्रियंका निरंजन ने जनपद में भ्रमण कर कई परीक्षा केन्द्रो का निरीक्षण किया। प्रथम पाली की परीक्षा में निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी ने पुलिस लाइन में स्थापित परीक्षा कंट्रोल रूम में भी जाकर व्यवस्थाओं को देखा तदुपरान्त कोषागार के डबल लाक में भी पहंुचकर व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया गया। द्वितीय पाली में जिलाधिकारी प्रियंका निरंजन ने ग्रामीण क्षेत्र के सावित्री इण्टर कालेज जमुनहिया, आर्दश इण्टर कालेज विसुन्दरपुर तथा नगरीय क्षेत्र में राजकीय इण्टर कालेज महुवरिया में पहंुचकर परीक्षा केन्द्र का निरीक्षण किया गया तथा केन्द्र व्यवस्थापको/प्राचार्यो को आवश्यक दिशा निर्देश दिया गया। इसके अतिरिक्त अपर जिलाधिकारी वि0/रा0 शिव प्रताप शुक्ल सहित अन्य उप जिला मजिस्ट्रेट के द्वारा भी अपने-अपने क्षेत्रो में परीक्षा केन्द्र पर भ्रमणशील रहकर निरीक्षण किया गया। जिला विद्यालय निरीक्षक अमर नाथ सिंह ने दोनो पालियो की परीक्षाओ के समाप्त होने के पश्चात बताया कि जनपद में कुल 21 परीक्षा केन्द्रो पर आयोजित प्रथम पाली में 9672 पंजीकृत परीक्षार्थियो के सापेक्ष 9262 परीक्षार्थी उपस्थित व 410 अनुपस्थित रहें इसी प्रकार द्वितीय पाली में कुल पंजीकृत 9672 परीक्षार्थियों में 9296 उपस्थित व 376 परीक्षार्थी अनुपस्थित रहें।
उत्तर प्रदेश में आरक्षी नागरिक पुलिस के पदो पर सीधी भर्ती परीक्षा सकुशल सम्पन्न
जनपद में कुल 21 परीक्षा केन्द्रो पर दो पालियों में आयोजित की गयी परीक्षा
जिलाधिकारी ने सकुशल व नकल विहीन परीक्षा सम्पन्न कराने के दृष्टिगत कई परीक्षा केन्द्रो का किया निरीक्षण
मीरजापुर 17 फरवरी 2024- उत्तर प्रदेश पुलिस आरक्षी नागरिक पुलिस भर्ती परीक्षा-2024 जनपद में सकुशल व शान्तिपूर्ण सम्पन्न कराया गया। शान्तिपूर्ण व नकल विहीन परीक्षा सम्पन्न कराने के दृष्टिगत जिलाधिकारी प्रियंका निरंजन ने जनपद में भ्रमण कर कई परीक्षा केन्द्रो का निरीक्षण किया। प्रथम पाली की परीक्षा में निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी ने पुलिस लाइन में स्थापित परीक्षा कंट्रोल रूम में भी जाकर व्यवस्थाओं को देखा तदुपरान्त कोषागार के डबल लाक में भी पहंुचकर व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया गया। द्वितीय पाली में जिलाधिकारी प्रियंका निरंजन ने ग्रामीण क्षेत्र के सावित्री इण्टर कालेज जमुनहिया, आर्दश इण्टर कालेज विसुन्दरपुर तथा नगरीय क्षेत्र में राजकीय इण्टर कालेज महुवरिया में पहंुचकर परीक्षा केन्द्र का निरीक्षण किया गया तथा केन्द्र व्यवस्थापको/प्राचार्यो को आवश्यक दिशा निर्देश दिया गया। इसके अतिरिक्त अपर जिलाधिकारी वि0/रा0 शिव प्रताप शुक्ल सहित अन्य उप जिला मजिस्ट्रेट के द्वारा भी अपने-अपने क्षेत्रो में परीक्षा केन्द्र पर भ्रमणशील रहकर निरीक्षण किया गया। जिला विद्यालय निरीक्षक अमर नाथ सिंह ने दोनो पालियो की परीक्षाओ के समाप्त होने के पश्चात बताया कि जनपद में कुल 21 परीक्षा केन्द्रो पर आयोजित प्रथम पाली में 9672 पंजीकृत परीक्षार्थियो के सापेक्ष 9262 परीक्षार्थी उपस्थित व 410 अनुपस्थित रहें इसी प्रकार द्वितीय पाली में कुल पंजीकृत 9672 परीक्षार्थियों में 9296 उपस्थित व 376 परीक्षार्थी अनुपस्थित रहें।
*”पत्रकारों के लिए बनाया गया प्रेस क्लब भवन, बांदा प्रेस क्लब को हस्तांतरित किया जाए”: अग्निहोत्री* आत्माराम त्रिपाठी की रिपोर्ट _बांदा, 16 अक्टूबर_
पत्रकारों के लिए बनाया गया प्रेस क्लब के भवन को बांदा प्रेस क्लब को सौंपा जाये, इस आशय का मांग पत्र सोमवार को बांदा प्रेस क्लब की _बबेरू इकाई के संरक्षक_ *डॉ. बुद्धि प्रकाश अग्निहोत्री* द्वारा _जिलाधिकारी_ *श्रीमती दुर्गा शक्ति नागपाल* को सौंपा गया। यह प्रेस क्लब बाबूलाल चौराहे के पास शहीद पत्रकार स्वर्गीय सुरेश चंद्र गुप्ता के नाम से बनाया गया था, जो काफी अरसे से बंद पड़ा है, जिससे वास्तविक पत्रकार इस भवन का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। इस पर जिला अधिकारी ने कार्यवाही करने का आश्वासन दिया है।
जिलाधिकारी को सौंपें गए मांग पत्र में कहा गया है कि जनपद के पत्रकारों के विधिमान्य संगठन बांदा प्रेस क्लब के पास आज तक कोई भवन नहीं है, जबकि शासन की मंशा अनुरूप प्रत्येक जनपद में प्रेस क्लब को भवन आवंटित किया जाना था। बांदा में भी उक्त शासनादेश के अनुरूप भवन निर्माण की कार्यवाही हुई और बांदा नगर पालिका के नजूल भूखंड 10555 रकबा 0.435 वर्ग मीटर पर विभिन्न निधियां के माध्यम से बांदा प्रेस क्लब के भवन का निर्माण बबेरू के शहीद पत्रकार सुरेश चंद्र गुप्ता जी के नाम पर कराया गया था। स्वर्गीय सुरेश चंद्र गुप्ता जी के अभिन्न मित्र व वर्ष 1983 को बबेरू में हुई उनकी जघन्य हत्या को उजागर कर परिजनों व उनके मित्रों को न्याय दिलाने वाले वरिष्ठ पत्रकार डॉ. बुद्धि प्रकाश अग्निहोत्री जी बांदा प्रेस क्लब की बबेरू इकाई के संरक्षक हैं। उनके मार्गदर्शन में आज बांदा के सैकड़ों पत्रकार एकजुट है। सभी पत्रकार एकजुट होकर प्रेस क्लब भवन को बांदा प्रेस क्लब को हस्तगत करने की मांग करते हैं, ताकि पत्रकारों को एकत्रित होने, बैठकों अथवा कामकाज निपटाने के लिए अन्यत्र व्यवस्था न करना पड़े।
इस सम्बन्ध में बबेरू प्रेस क्लब के _संरक्षक_ *डॉ. बुद्धि प्रकाश अग्निहोत्री* ने बताया कि शहीद पत्रकार स्वर्गीय सुरेश चंद्र गुप्ता के नाम पर बनाया गया प्रेस क्लब भवन काफी दिनों से बंद पड़ा है। इसे चालू करने की जरूरत है। जिस प्रयोजन के लिए इसे बनाया गया था, पत्रकारों के हित में इसे खोला जाना चाहिए।
वहीं बांदा प्रेस क्लब के _अध्यक्ष_ *दिनेश निगम दद्दा जी* ने बताया कि यह भवन कांजी हाउस की जमीन पर बना है, जिसे 1983 में शहीद हुए पत्रकार सुरेश चंद्र गुप्ता के नाम पर प्रेस क्लब भवन का नाम दिया गया था, जो वर्तमान समय में बंद पड़ा है। पत्रकारों के लिए बनाए गए इस भवन को मीडिया से सम्बन्धित सूचना विभाग को दे दिया जाए, ताकि शासन से सूचना विभाग भवन के लिए आए धन से वहां सूचना विभाग का भवन बन सके और नीचे के हिस्से में प्रेस क्लब संचालित हो सके।
ज्ञापन देने वालों में प्रेस क्लब के महासचिव सचिन चतुर्वेदी, कोषाध्यक्ष राजेंद्र खत्री, सचिव सुनील सक्सेना, संरक्षक कमल सिंह व मो. इदरीश, संयुक्त सचिव श्रीष पांडे, विशेष प्रोटोकॉल सचिव रोहित धुरिया, सरोज त्रिपाठी, कु. मंजू शर्मा, अरविंद श्रीवास्तव, श्रीकांत श्रीवास्तव सहित बबेरू कमेटी से आए अध्यक्ष उमेश श्रीवास्तव, वरिष्ठ उपाध्यक्ष मुफीद आलम, विशेष प्रोटोकॉल सचिव संजय सिंह, अनिरुद्ध सोनी सहित दर्जनों पत्रकार उपस्थिति रहे। साथ ही प्रेस क्लब नरैनी कमेटी के अध्यक्ष मयंक शुक्ला, संतोष सोनी, सुशील कुमार मिश्रा, वकील खान सहित दर्जनों लोग नरैनी से आए।
उपरोक्त प्रेस क्लब परिवार के सभी पत्रकारों का महासचिव सचिन चतुर्वेदी द्वारा आभार व्यक्त किया गया।
आत्माराम त्रिपाठी की रिपोर्ट लखनऊ, 10 जुलाई, यूपी वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन (यूपीडब्लूजेयू) के प्रदेश अध्यक्ष पद पर कार्यकाल के दो वर्ष पूरा होने पर राजधानी लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकारों सहित संगठन के पदाधिकारियों ने टी.बी. सिंह को बधाई दी है। इस अवसर टी.बी. सिंह ने लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार आशीष अवस्थी को प्रदेश सचिव मनोनीत करते हुए उन्हें प्रचार एवं प्रकाशन का जिम्मा सौंपा है। सोमवार को यूपीडब्लूजेयू के कैंप कार्यालय में पहुंच कर संगठन के पदाधिकारियों सहित राजधानी के कई वरिष्ठ पत्रकारों ने टी.बी. सिंह को बधाई दी और आगे के लिए शुभकामनाएं भी दी। यूपीडब्लूजेयू, भारत के सबसे बड़े पत्रकार संगठन इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट (आईएफडब्लूजे) से संबद्ध प्रदेश ईकाई है। इस मौके पर आईएफडब्लूजे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हेमंत तिवारी ने कहा कि टी.बी.सिंह ने दो वर्षों में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में यूपीडब्लूजेयू की इकाइयों का गठन किया और संगठन में जान फूंकी है। उन्होंने कहा कि अल्प समय में ही टी.बी.सिंह ने प्रदेश के पत्रकारों से जुड़ी समस्याओं को बड़े पैमाने पर उठाया है और कल्याण के काम किए हैं। इस मौके पर टी.बी.सिंह ने कहा कि विगत दो वर्षों में प्रदेश के दो तिहाई जिलों में यूपीडब्लूजेयू की ईकाई बन चुकी है और अगले एक साल में प्रदेश के हर जिले में संगठन दिखेगा और पत्रकारों के हित में और भी काम किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि अगस्त के महीने में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसी जिले में यूपीडब्लूजेयू की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक बुला कर आगे की रणनीति का एलान किया जाएगा। उन्होंने प्रदेश के युवा सक्रिय पत्रकार चंदन मिश्रा को संगठन में शामिल करने का एलान भी किया। टी.बी सिंह को बधाई देने में संगठन के प्रदेश संगठन सचिव अजय त्रिवेदी, प्रदेश में वरिष्ठ सचिव उत्कर्ष सिन्हा, प्रदेश सचिव राजेश मिश्रा, पी.पी. सिंह, वीरेंद्र सिंह, लखनऊ मंडल अध्यक्ष एंथोनी सिंह, चंदन मिश्रा और आईएफडब्लूजे के राष्ट्रीय सचिव सिद्धार्थ कलहंस शामिल रहे। सभी वरिष्ठ पत्रकारों ने प्रदेश ईकाई में सचिव पद पर मनोनीत आशीष अवस्थी को बधाई देते हुए उनका स्वागत भी किया।
सन्तराम बी. ए. –जीवन परिचय 31-05-1988 (निर्वाण दिवस)
संतराम बी.ए. के बारे में आप क्या जानते हैं ?
संतराम बी.ए. के चिंतन पर आने से पहले उनके व्यक्त्वि और कृतित्व के सम्बन्ध में जानना उचित होगा। संतराम बी.ए. का जन्म 14 फरवरी,1887 को बसी नामक गांव होशियारपुर, पंजाब में हुआ था। इनके पिता का नाम रामदास गोहिल और माता का नाम मालिनी देवी था। रामदास गोहिल ने प्रथम पत्नी के देहांत के बाद पुनर्विवाह किया था। संतराम बी.ए. बताते हैं कि पहली माँ से दो सन्तान और दूसरी माता से पाँच सन्तानें थी। इस तरह संतराम बी.ए. सात भाई बहन थे। संतराम बी.ए. ब्रिटिश भारत के ग्रेजुएट थे। इनको विद्यार्थी जीवन में ही जातिवाद का दंश झेलना पड़ा था। जब संतराम बी.ए. पाँचवी कक्षा के विद्यार्थी थे तो उनके सहपाठी उन्हें कुम्हार कह कर अपमानित किया करते थे।
कुलीन वर्ग अपने बच्चो को जन्म से जातिवाद का पाठ पढ़ाकर उनके मन में शूद्र और अतिशूद्र के प्रति घृणा डाल देते हैं। संतराम बी.ए. ने ग्रेजुएट करने के बाद अमृतसर जिले के चभाल गांव के मिडिल स्कूल में प्रधानाध्यपक नियुक्त किए गए लेकिन नौकरी में इनका विशेष मन नहीं लगा और सन् 1913 में इन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी।
संतराम बी.ए. के रचना संसार का फलक बहुत विस्तृत और व्यापक है। इन्होंने अपने जीवन काल में सतहत्तर किताबें सामाजिक और देश दशा के विषयों पर लिखी हैं। इनके साहित्यिक कद का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इनकी किताब ‘काम-कुंज’ (1929) का संपादन प्रेमचन्द ने किया था, जो लखनऊ के मुंशी नवलकिशोर प्रेस से छपी थी।
संतराम बी.ए. एक अच्छे अनुवादक भी थे। इन्होंने ‘अलबेरूनी का भारत’ का अनुवाद किया जिसे इन्डियन प्रेस, प्रयाग ने चार भागों में प्रकाशित किया था। इसके अलावा संतराम बी.ए. ने ‘गुरूदत्त लेखावाली’ (1918) ‘मानव जीवन का विधान’ (1923) ‘इत्सिंग की भारत यात्रा’(1925) ‘अतीत कथा’(1930) ‘बीरगाथा’(1927) ‘स्वदेश-विदेश-यात्रा’ (1940) ‘उद्बोधनी’ (1951) ‘पंजाब की कहानियाँ’ (1951) ‘महाजनों की कथा’ (1958) पुस्तकों के अलावा ‘मेरे जीवन के अनुभव’(1963) नाम से आत्मकथा लिखी है। संतराम बी॰ ए॰ की आत्मकथा ‘मेरे जीवन के अनुभव’ कई मायने में महत्वपूर्ण हैं। यह आत्मकथा नवजागरण कालीन समाज के उस विमर्श को हमारे सामने रखती है जिसको हिन्दी लेखक अकसर छुपा लिया करते हैं। अस्मितावादी विमर्शों के दौर में यह आत्मकथा और महत्वपूर्ण लगने लगती है। हिन्दी साहित्य की यह एक अनूठी आत्मकथा है जिससे पता चलता है कि जातिवाद की मूल जड़ें कहाँ है ?
संतराम बी.ए. नवजागरण काल के अद्भुत लेखक और कुशल संपादक थे। इन्होंने पाँच पत्रिकाओं का संपादन किया-‘उषा’(1914, लाहौर), ‘भारती’ (1920,जलन्धर), ‘क्रांति’ (1928, उर्दू लाहौर), ‘युगान्तर’ (जनवरी 1932, लाहौर), और ‘विश्व ज्योति’(होशियारपुर)। ‘युगान्तर’ नवजागरण काल की बड़ी क्रांतिकारी पत्रिका थी। इस पत्रिका में जाति और वर्ण-व्यवस्था पर बड़े ही तीखे और आलोचनात्क लेख लिखे जाते थे।
संतराम बी.ए. ने हिन्दू मनोवृत्ति को बड़ी गहराई से परख लिया था। इन्होंने अस्पृश्यता और जाति की जड़ ‘वर्ण-व्यवस्था’ को माना था। इनकी दृष्टि में जाति और वर्ण-व्यवस्था एक सामाजिक बुराई थी, जिसने शूद्र और अतिशूद्र को गुलाम के रुप में स्थापित कर दिया था। यह सही बात है कि उच्च वर्ण के हिन्दुओं ने वर्ण-व्यवस्था को ईश्वरीय विधान का जामा पहनाने का काम किया है। संतराम बी.ए. ने इस सिंद्धात को नकार दिया था कि ‘वर्ण-व्यवस्था ईश्वरी विधान’ है। इनका प्रबल दावा था कि ब्राह्मणों ने वर्ण-व्यवस्था को अपने स्वार्थपूर्ति के लिए गढ़ा और बनाया है। इस व्यवस्था का घोषित लक्ष्य ब्राह्मणों को अपना वर्चस्व स्थापित कर समाज को चौरंगा बना देना था।
संतराम बी.ए. की स्थापना थी कि अस्पृश्यता का मुख्य कारण वर्ण-व्यवस्था है। जब तक वर्ण व्यवस्था का खात्मा नहीं हो जाता; तब तक शूद्र और अतिशूद्र को समाजिक प्रतिष्ठा और न्याय प्राप्त नहीं हो सकता है। संतराम बी.ए. ने ‘जात-पांत और अछूत प्रथा’ लेख में अस्यपृश्यता का कारण बताते हुए लिखा था :
‘‘इस अछूतपन का मूल कारण हिन्दुओं की वर्ण-व्यवस्था या जात-पांत है। जब तक इस रजरोगी की जड़ नहीं कटती, अस्पृश्यता कदापि दूर नहीं हो सकती। जो लोग वर्ण-व्यवस्था को कायम रखते हुए अछूतपन को दूर करने का यत्न करते हैं वे ज्वर के रोगी का हाथ बर्फ में रखकर उसका ज्वर शान्त करने का उपाय करते हैं।’’1
इस कथन से संतराम बी.ए तत्कालीन समय के सुधारवादियों को वर्ण-व्यवस्था के संबंध में दुरुस्त करते हुए दिखाई देते हैं। संतराम बी.ए. ने वर्ण-व्यवस्था को समाज-विभाजित करने वाला कारक ही नहीं बल्कि बहुजनों के लिए मरण-व्यवस्था के तौर पर देखा था। इन्होंने वर्णवाद के रखवालों से प्रश्न किया था कि ‘यह वर्ण-व्यवस्था है या मरण व्यवस्था ?’ इनकी नजर में वर्ण-व्यवस्था कोई ईश्वरीय नहीं थी जिस पर सवाल न उठाया जाए:
‘जन्म-मूलक वर्ण-व्यवस्था कोई ईश्वर नहीं, जिसके विरुद्ध आवाज उठाना घोर नास्तिकता समझी जाए। अपने समाज के कल्याण के लिए इसे हम एकदम ठुकरा सकते हैं। हमें इसमें किसी का भय नहीं है।’’2
औपनिवेशिक दौर के सुधारक और लेखक जब सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करते तो वर्ण-व्यवस्था के रक्षक उन्हें ‘दयानंद पंथी’, ‘विलायत पंथी’ और ‘नास्तिक पंथी’ का तमगा प्रदान करने में जरा भी देर नहीं लगाते थे। संतराम बी.ए. जाति और वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध जैसे ही कुछ लिखते वैसे ही उच्च श्रेणी के हिन्दू लेखक इनके खिलाफ पत्र-पत्रिकाओं में मोर्चा खोल देते थे। यह बड़ी दिलचस्प बात है कि हिन्दी के प्रसिद्ध भाषाविद् किशोरीदास बाजपेयी और हिन्दी साहित्य के मजबूत स्तंभ सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ संतराम बी.ए. का विरोध करते दिखाई देते हैं।
किशोरीदास बाजपेयी ने संतराम बी.ए. द्वारा उठाया गया सवाल कि ‘वर्ण-व्यवस्था ही जातिवाद की जननी है’ का खण्डन कर वर्ण-व्यवस्था के मंडन में उतर आए थे। किशोरीदास बाजपेयी का स्पष्ट कहना था कि वर्ण-व्यवस्था अस्पृश्यता की जनक नहीं है। इस भाषाविद् ने लिखा था :
‘‘वर्ण-व्यवस्था अछूतपन की जननी है, यह केवल अज्ञान-प्रलाप है। कोई भी तर्क या अनुभव इसमें प्रमाण नहीं और न दिल ही मानता है। वर्ण-व्यवस्था से इस पाप का संपर्क बतलाना तो ऐसा ही है, जैसे सूर्य में अंधकार बतलाना।’’3
यह जानते हुए कि वर्ण मूलक व्यवस्था ने शूद्र, अतिशूद्र और स्त्रियों पर कितना जुल्म और अत्याचार ढ़ाया है; इसके बावजूद इस भाषाविद् ने वर्ण-व्यवस्था को समाज के लिए कल्याणकारी व्यवस्था के तौर पर देखा था। इस भाषाविद् ने संतराम बी.ए. पर ‘पाश्चात्यवादी चश्मा’ का आरोप जड़कर भारतीय संस्कृति को जानने की नसीहत तक दे डाली थी।
अब सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की बात की जाए। जब संतराम बी.ए. ने ‘जात-पांत-तोड़क मण्डल’ बनाया और इस मण्ड़ल की चर्चा जोर पकड़ने लगी तब सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने ‘वर्णाश्रम-धर्म की वर्तमान स्थिति’ लेख लिखकर संतराम बी.ए. और इनके ‘जात-पांत-तोड़क मण्डल’ के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। निराला की दृष्टि में यह मण्डल अप्रासंगिक था क्योंकि यह जात-पांत तोड़ने की बात करता था। इनकी दृष्टि में मण्डल की प्रासंगिकता तब होती जब यह ‘जात-पांत-तोड़क’ नहीं ‘जात-पांत-योजक’ होता। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ लिखते हैं :
‘‘जात-पाँत-तोड़क मण्डल’’ मंत्री संतराम बी.ए. के करार देने से इधर दो हजार वर्ष के अन्दर का संसार का सर्वश्रेष्ठ विद्वान् महामेधावी त्यागीश्वर शंकर शूद्रों के यथार्थ शत्रु सिद्ध हो सकते हैं। शूद्रों के प्रति उनके अनुशासन, कठोर-से-कठोर होने पर भी, अपने समय की मर्यादा से दृढ़ सम्बन्ध हैं। खैर, वर्ण-व्यवस्था की रक्षा के लिए जिस ‘‘जायते वर्ण संकरः’’ की तरह के अनेकानेक प्रमाण उद्धृत किए गए हैं, उनकी सार्थकता इस समय मुझे तो कुछ भी नहीं देख पड़ती, न ‘‘जाति-पाँत-तोड़क मण्डल’’ की ही विशेष कोई आवश्यकता प्रतीत होती है। ‘‘जात-पाँत-तोड़क मण्डल’’ को मैं किसी हद तक सार्थक समझता, यदि वह ‘जाति-पाँति-योजक मंडल’ होता।”4
निराला की चिंता थी कि संतराम बी.ए. जात-पांत-तोड़क मण्डल की स्थापना कर जाति तोड़ने का उद्यम क्यों कर रहे हैं ? निराला चाहते थे कि संतराम बी.ए. को ‘ब्रह्म समाज’ की शाखा लाहौर में स्थापित कर जाति जोड़ने का काम करना चाहिए था। इनके अनुसार हिन्दू सुधारकों का पिछलग्गू बनकर संतराम बी.ए.को समाज सुधार का कार्य करना चाहिए था।
सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने संतराम बी.ए.की पढ़ाई के बहाने शूद्र और अतिशूद्रों की शिक्षा का मजाक उड़ाया था। इस महाकवि की दृष्टि में अंग्रेजी शिक्षा पाकर शूद्र उद्दंड हो गए हैं। इस शिक्षा के बल पर भारतीय संस्कृति और वर्ण विधान को चौपट करने में लगे हुए हैं। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने संतराम बी.ए. की शिक्षा का मजाक उड़ाते हुए लिखा था:
‘‘अंग्रेजी स्कूलों और कालेजों में जो शिक्षा मिलती है, उससे दैन्य ही बढ़ता है और अपना अस्तित्व भी खो जाता है। बी.ए. पास कर के धीवर, लोध अगर ब्राह्मणों को शिक्षा देने के लिए अग्रसर होंगे, तो संतराम बी.ए. की तरह हास्यास्पद होना पडे़गा।’’5
यह निराला का उच्चवर्णीय दंभ नहीं तो और क्या है ? यह तो वर्ण व्यवस्था के विधान के अनुकूल बात हो गई कि जिसमें कहा गया कि कोई ‘शूद्र ज्ञानवान’ होते हुए भी ब्राहाण को शिक्षा नहीं दे सकता है। गौरतलब है कि संतराम बी.ए. कुम्हार जाति के थे। वर्ण-विधान के अनुसार वे शूद्र वर्ण में आते है। पंडितों को यह बात शूल की तरह चुभ रही थी कि पिछड़े समाज का व्यक्ति ब्राहृाणों का गुरू कैसे बन गया है ! यह वर्ण व्यवस्था का चमत्कार ही कहा जायगा कि शुद्र, अतिशूद्र और स्त्रियों को प्राणविहीन और उच्च वर्ण के हिन्दुओं को महाप्राण बनाने का काम किया है।
*संतराम बी.ए.ने जाति को मिटाने का औजार ‘अंतरजातीय विवाह’ को बताया था।*
ध्यातव्य है कि जात-पांत-तोड़क मण्डल ने जाति व्यवस्था को मिटाने के लिए अंतरजातीय विवाह पर बल दिया था। संतराम बी.ए. का विश्वास था कि यदि उच्च श्रेणी के हिन्दू रोटी-बेटी की बेड़ियां तोड़ दें तो समाज से जाति व्यवस्था मिटाई जा सकती है। संतराम का सुझाया गया अंतरजातीय विवाह का नुस्खा उच्च वर्ण के लेखकों को रास नहीं आया था। दरअसल, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ तो अंतरजातीय विवाह के पक्ष में बिल्कुल नहीं थे। अंतरजातीय विवाह को लेकर उनके विचार थे :
‘‘अछूतों के साथ रोटी-बेटी का संबंध स्थापित कर, उन्हें समाज में मिला लिया जाए या इसके न होने के कारण ही एक विशाल संख्या हिन्दू राष्ट्रीयता से अलग है, यह एक कल्पना के सिवा और कुछ नहीं। दो मनों की जो साम्य-स्थिति विवाह की बुनियाद है और प्रेम का कारण, इस तरह के विवाह में उसका सर्वथा अभाव ही रहेगा। और, जिस यूरोप की वैवाहिक प्रथा की अनुकूलता संतराम जी ने की है वहाँ भी यहीं की तरह वैषम्य का साम्राज्य है’’6
यह ब्रिटिश भारत की ऐताहासिक घटना थी कि जात-पाँत तोड़क मण्डल ने सैकड़ों अंतरजातीय विवाह करवाये थे। इस तरह संतराम बी. ए. आधुनिकता से लैस सुधारक और विचारक के रुप में सामने आते हैं। इनके सिद्धांत और व्यवहार में अंतर नहीं था। इन्होंने पत्नी का देहांत हो जाने के बाद एक विधवा से अंतरजातीय विवाह कर समाज में मिसाल कायम की थी।
संतराम बी.ए. की मंशा थी कि अंतरजातीय विवाह को कानूनी मान्यता मिले। इसके लिए इन्होंने बी.जे पटेल बिल का जमकर समर्थन किया था। सन् 1918 में बी.जे. पटेल ने अंतरजातीय विवाह को वैद्यता के लिए लेजिस्लेटिव असेम्बली में बिल पेश किया गया था। बिल में इस बात पर विशेष जोर दिया गया था कि जो लोग अंतरजातीय विवाह करते हैं उनके विवाह को कानूनी मान्यता प्रदान की जाए। इस बिल में एक बात और जोड़ी गई थी कि अंतरजातीय विवाह से उत्पन्न संतान को अपने बाप-दादा की पैतृक सम्पति में अधिकार दिया जाए। दरअसल, अंतरजातीय विवाह करने वाले लोगों की यह समस्या थी कि उनके अंतरजातीय विवाह को हिन्दू लॉ के अनुसार तत्कालीन समय में वैध नहीं माना जाता था। इस समस्या के समाधान के लिए ही ‘पटेल-बिल’ लाया गया था। इस बिल का तत्कालीन समाज में घोर विरोध हुआ था। सनातनधर्म-सभा, लाहौर ने पटेल-बिल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। इसके आलावा अमृतराय जर्नलिस्ट ने अट्ठाईस पृष्ठों का अंग्रेजी में पैम्फलेट लिखकर लोगों में बंटवाया था। इस पैम्फलेट में अंतरजातीय विवाह के विरोध में अनेक दलीलें पेश की गई थीं और सरकार से यह अपील की गई थी कि हिन्दू जन भावनाओं का ध्यान रखते हुए इस बिल को पास न किया जाए।
संतराम बी.ए. ने ‘अंतरजातीय विवाह’ लेख लिखकर अमृतराय की आपत्तियों का बड़ा ही तार्किक खण्डन किया था। अमृतराय की आपत्ति थी कि अंतरजातीय विवाह हिन्दू भावना के विरुद्ध है। संतराम बी.ए. ने इस आक्षेप के जवाब में लिखा था :
‘‘आपको देश की स्थिति का ठीक से ज्ञान नहीं जान पड़ता, नहीं तो आप ऐसा न कहते। लोग बिरादरियों के संकीर्ण क्षेत्रों से तंग हैं, पर आप जैसे कट्टर पौराणिकों ने उनको इतना भयभीत कर रखा है कि जाति के बाहर जाने का साहस ही नहीं रहा।’’ 7
संतराम बी.ए. हिन्दुओं की कथनी और करनी को लेकर सवाल उठाते थे। वे हिन्दुओं से पूछते थे कि आप चमारों और भंगियों से भेदभाव क्यों करते हैं? अछूतों को सर्वजानिक संपत्ति का उपयोग करने से क्यों वंचित कर रखा है ? अछूतों को कुओं से पानी भरने का अधिकार क्यों नहीं दिया जा रहा हैं ? हिन्दू सुधारक अछूत मुद्दों पर अपनी चुप्पी क्यों साध लेते हैं ? इन तीखे सवालों का जवाब वर्णवादियों के पास नहीं था। इसलिए संतराम बी.ए. की योग्यता पर सवाल उठाया गया इनको हिन्दू संस्कृति के विध्वंसक का खिताब दिया गया। इस से आगे बढ़कर इन्हें मिस मेयो कैथरीन का भाई बताया गया। गौरतलब है कि मिस मेयो कैथरीन ने ‘मदर इन्डिया’ नामक एक मारक किताब लिखी थी।
*संतराम बी.ए. का बाबा साहब अम्बेडकर से घनिष्ठ सम्बन्ध था।*
सन्तराम बी ए ने डा.आम्बेडकर को सन् 1936 में जात-पांत-तोड़क मण्डल के वार्षिक अधिवेशन का अध्यक्ष बनाया था। जात-पांत-तोड़क मण्डल के वार्षिक अधिवेशन का उद्देश्य यह था कि जाति व्यवस्था को कैसे मिटाया जाए ? जांत-पांत तोड़क मण्डल के वार्षिक अधिवेशन होने के कुछ दिन पहले ही डा़. आम्बेडकर ने जाति-व्यवस्था से तंग आकर यह घोषणा कर दी थी कि ‘यद्यपि मैं हिन्दू जन्मा हूँ लेकिन हिन्दू के रुप में मरूंगा नहीं’। डा. आम्बेडकर की इस घोषणा से पूरे देश में तहलका मच गया था। लाहौर के भद्रवर्ग समाज ने संतराम बी.ए. को धमकी दे डाली कि यदि डा.आम्बेड़कर मण्डल के वार्षिक अधिवेशन में आयेंगे तो हम काला झण्डा दिखाकर उनका विरोध करेंगे। संतराम बी.ए. ने अंत में डा.आम्बेडकर की गरिमा का ख्याल रखते हुए सन् 1936 में होने वाले जात-पांत-तोड़क मण्डल का वार्षिक अधिवेशन स्थगित कर दिया। संतराम बी.ए. ने इस प्रकरण पर अपनी आत्मकथा में लिखा है :
‘‘डा. आम्बेडकर को अध्यक्ष बनाने का मेरा एक उद्देश्य यह भी था कि जो बात हम डाक्टर साहब को तर्क से नहीं मनवा सके वह उनके हृदय को अपील करके प्रेम से मनवाने के यत्न करें। परन्तु जब मैंने देखा कि लाहौर के प्रतिष्ठित सज्जन काले झण्ड़े दिखाएंगे तो मैंने सम्मेलन को स्थगित कर देना ही उचित समझा।’’8
हिन्दुओं की संकीर्ण मानसिकता के चलते यह सम्मेलन भले ही स्थगित हो गया था लेकिन सुखद पहलू यह था कि संतराम बी.ए. ने बाबा साहब के भाषण ‘जाति उच्छेद’ को जात-पांत-तोड़क मण्डल की ओर से प्रकाशित कर वितरित कर दिया था। यही भाषण बाद में *’Annihilation of cast’* नाम से किताब के रूप में प्रकाशित हुआ। डा.अम्बेडकर से ‘एनिहिलेशन आफ कास्ट’ किताब लिखवाने का श्रेय संतराम बी.ए. को दिया जाना चाहिए।
जब ‘एनिहिलेशन आफ कास्ट’ किताब छपी तो महात्मा गांधी ने ‘हरिजन’ पत्र के 11 और 18 जुलाई 1936 के अंक में आलोचना की। संतराम बी.ए. ने गांधी जी की आलोचना का जवाब ‘हरिजन’ पत्र में ही दिया था। संतराम बी.ए. ने गांधी के लेख पर कई सवाल भी उठाए थें। इन्होंने गांधी जी से पूछा था कि आप अस्पृश्यता को दूर करने का उपाय तो करते हैं लेकिन वर्ण-व्यवस्था का बचाव क्यों करते हैं ? यह भी सवाल उठाया था कि जाति व्यवस्था का शास्त्रों में समाधान खोजना वैसा ही है जैसे कीचड़ को कीचड़ से धोना। संतराम बी.ए. के समकालीन हिन्दू लेखक और सुधारक वर्ण व्यवस्था को खत्म किए बिना ही अस्पृश्यता और जात-पांत को मिटाना चाहते थे। जबकि संतराम बी.ए. वर्ण-व्यवस्था को ही खत्म करने की बात कर रहे थे। इनका मानना था कि जब तक जाति व्यवस्था की जड़ वर्ण-व्यवस्था नहीं मिटेगी शूद्रों और अतिशूद्रों की समस्या का समाधान नहीं होगा।
संतराम बी.ए जीवन भर जाति-व्यवस्था के भयंकर उत्पातों को सामने लाकर इसे मिटाने का संघर्ष करते रहे। संतराम बी.ए. ने समाज को समतल बनाने के लिए जिन सिद्धातों पर काम किया उनमें पहला सिद्धांत था कि वर्ण-व्यवस्था को खत्म कर दिया जाये। यदि वर्ण-व्यवस्था खत्म होती है तो स्वतः लोग समता और समतल का रास्ता अपने आप पकड़ कर चलाने लगेंगे। इनका दूसरा सिद्धांत था कि समाज में यदि अंतरजातीय विवाह का प्रचलन शुरु कर दिया जाए तो जाति-व्यवस्था की जड़ आपने आप सूख जायेगी। एक तरह से संतराम बी.ए. रोटी और बेटी की हंदबदी के एकदम खिलाफ थे। संतराम बी.ए. वर्णवादियों के सवालों से घबराते नहीं थे; अपने खिलाफ सवालों का बड़ा ही तार्किक जवाब दिया करते थे। हिन्दी नवजागरण की शायद ही कोई पत्रिका रही होगी जिसमें संतराम बी.ए. ने जाति व्यवस्था के खिलाफ लिखा न हो। संतराम बी.ए. ने जाति व्यवस्था और वर्ण-व्यवस्था की जड़ पर खुलकर प्रहार किया। अपने सिरहाने मनुस्मृति रखकर सोने वाले विद्वानों की मानसिकता पर मारक प्रहार किया। संतराम बी.ए. जाति और वर्ण-व्यवस्था के जानी दुश्मन थे। इस मानव विरोधी दुश्मन पर जितना मारक प्रहार इन्होंने किया शायद ही नवजागरण कालीन किसी हिन्दी लेखक ने किया था। ताज्जुब होता कि हिन्दी के आलोचकों ने उनके योगदान का नोटिस तक नहीं लिया। ———————-
जब से जातिवार जनगणना, जन संख्या अनुपात में भागीदारी और सम्पूर्ण मंडल कमीशन की मांग को लेकर मण्डल यात्रा शुरू हुई है तभी से सामाजिक न्याय विरोधी ताकतें मेरे खिलाफ सक्रिय हैं।
बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा से पूंछा गया कि यदि आप प्रधानमंत्री बने तो क्या करेंगे….???
बाबू जगदेव प्रसाद – सरकारी, गैर सरकारी और अर्ध सरकारी नौकरियों में सबसे पहले 90 सैकड़ा शोषितों के लिए 90 सैकड़ा जगह सुरक्षित कर दूंगा।
— Aniruddh Singh Vidrohi (@MandalArmyCheif) May 8, 2023
मुझे न सिर्फ जेल भेजने की साजिश रची जा रही है बल्की सार्वजनिक रूप से जान से मारने जैसी धमकियां भी दी जा रहीं हैं। वो किसी भी शर्त पर उत्तर प्रदेश में 26 मई से शुरु हो रही मण्डल यात्रा को रोकना चाहते हैं।
मुझे न जेल जाने का डर है न उनकी धमकियों का खौफ है। मैं शोषित समाज के लिए लड़ रहा हूं इसलिए मैं उन धमकियों को सोशल मीडिया पर सार्वजनिक कर खुद को कमजोर समझने का अवसर नहीं दे सकता हूं और न मै लड़ने में कमजोर हूं। मण्डल यात्रा किसी भी शर्त पर हम रुकने नहीं देंगे।
अंबेडकरवाद मंडलवाद कर्पूरीवाद कोई जहर नही है यह तो शुद्ध देशी घी है जो गधो को रास नही आता और कुत्तो को हजम नही होता।। जय भीम जय कर्पूरी जय मंडल#मंडल_यात्रा@MandalArmy_@alokyadav521 @amitmandaljnu @OfficeofVidrohi @JaikyYadav16
हम यह जानकारी सिर्फ आपके बीच साझा कर रहे हैं हमें उम्मीद है कि आप साथ देगे पर कितना साथ देंगे? कितनी मदद करेगें? हमें नहीं पता।
चलो अच्छा हुआ इस हेटस्पीच @MandalArmy_ के राष्ट्रीय अध्यक्ष @OfficeofVidrohi जी कि जातिगत जनगणना कि आवाज भाजपा शाषित राज्य आखिर पहुच ही जाएगी।यही पागलपन शायद 10% आरक्षण लाभ लेने वाले को चुभ रहा हे… https://t.co/igVq5WynSb
हम सिर्फ आपसे यह अपील करना चाहते हैं कि मण्डल यात्रा को रुकने न दें इसे जारी रखने में हमारी मदद करें।
धन्यवाद 🙏🙏
आपका अनिरुद्ध सिंह विद्रोही प्रमुख मंडल आर्मी संयोजक मंडल यात्रा सम्पर्क सूत्र – 7253991760
चालबाजी के जरिए हमारे संगठन के लोगों को प्रताड़ित करके सोच रहे हैं की हम डर जायेंगे पीछे हट जाएंगे । मंडल यात्रा अपने तय समय पर शुरू होगी और जब तक जातिगत जनगणना और अन्य मांगे नहीं पूरी होंगी यात्रा समापन के बाद अनिश्चितकालीन धरने पर बैठेंगे जेल भेजा गया तो जेल में धरना देंगे ।2/2
— Prem Prakash Yadav (@premprakashjnp) May 8, 2023
प्रयागराज।।।आज यादव उत्थान समिति भारत के कार्यकर्ताओं ने प्रयागराज के खेवराजपुर में हुई सामूहिक हत्या के विरोध में एक ज्ञापन मुख्यमंत्री को सौंपा और परिवार की सुरक्षा की मांग की
प्रयागराज।।।आज यादव उत्थान समिति भारत के कार्यकर्ताओं ने प्रयागराज के खेवराजपुर में हुई सामूहिक हत्या के विरोध में एक ज्ञापन मुख्यमंत्री को सौंपा और परिवार की सुरक्षा की मांग की गई जिसमे कहा गया कि प्रयागराज में आये दिन ऐसी घटनाओं से प्रयागराज की जनता का दिल दहल गया है लोग असुरक्षित महसूस कर रहे हैं इस मामले की सीबीआई जांच की मांग की गई है साथ ही सुनील यादव को एक शस्त्र लाइसेंस एवं परिवार को 50 लाख की आर्थिक रुपये की मांग की गई इस मौके पर यादव उत्थान समिति चेयरमैन एवं इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता सत्यवेन्द्र यादव आजाद,एडवोकेट राकेश यादव,एडवोकेट सच्चिदानंद यादव,एडवोकेट अभिषेक रंजन यादव,मनोज यादव,संजीव यादव,अनिल यादव,विनय यादव,लवलेश यादव,जिज्ञानशू यादव,कृष्णानन्द यादव आदि उपस्थित रहे।।
‘तुम में जहर नहीं है, इसलिए तुम कमजोर हो!’ सांप ने चूहे से कहा।
‘जिसके अंदर जहर होता है दुनिया उसकी इज्जत करती है…उनका सिक्का चलता है।’ ‘आज तुम्हारा जहर ही तुम्हारे लिए अमृत है!’
चूहा ध्यान से सब सुनता रहा।
‘जब तुम्हारे पास जहर होगा, तभी लोग तुमसे डरेंगे!’ सांप शांत स्वर में बोला।
चूहे को बात समझ में आयी।
‘फिर मुझे क्या करना चाहिए!’ चूहे ने पूछा।
‘सीधी-सी बात है…तुम्हें अपने अंदर जहर पैदा करना चाहिए!’
‘वह सब तो ठीक है, मगर अपने अंदर जहर कैसे पैदा करूँ!’ स्पष्ट था कि चूहा हर हाल में समाधान चाहता था।
‘तुम चाहो तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ!’ सांप ने मदद की पेशकश की।
‘कैसे!’
‘चाहो तो मुझसे जहर ले लो!’
ताकत की चाह में चूहे ने फौरन हामी भर दी। सांप मुस्कुराया।
फिर क्या था,मौका मिलते ही सांप ने अपना जहर चूहे में उतार दिया। रगों में लहू के साथ जहर मिलते ही चूहे का बदन नीला पड़ गया। चूहा हमेशा के लिए शांत हो गया।
चूहे की डेड बॉडी लेकर सांप अपनों की सभा में पहुँचा। जहाँ उसका अभूतपूर्व स्वागत हुआ। चूहे की डेड बॉडी देखकर सभी सांप उत्साह से भर उठे। वे जोर-जोर से फुफकारते हुए नारे लगाने लगे। सभा शुरू हुई।
‘दोस्तो! मेरे प्यारे दोस्तो!’ सांप बोला। साथी सांप गौर से उसे सुनने लगे। वहाँ शांति छा गई।
‘दोस्तो! जैसा कि मैंने आप से कहा था, वह मैंने कर दिखाया है।’ ‘रिजल्ट आप सबके सामने है।’ चूहे की डेड बॉडी को दिखाते हुए वह बोला।
सभी सांपों ने हिश! हिश! करके उसका समर्थन किया।
वह आगे बोला,’हम पहले से ही बहुत बदनाम हैं अब हमें और बदनाम नहीं होना है! अब देखिए साथियो! मैंने यह काम लोकतांत्रिक ढंग से किया।’ …
अब हम पर कोई हिंसा का इल्जाम नहीं लगा सकता। इस चूहे ने मुझसे खुद जहर मांगा…’ यह कहते हुए सांप का फन तन गया।
सभी सांपों ने हिश! हिश! कर काफी देर तक अपनी खुशी जाहिर की ।
‘साथियो! आप पहले दिलों में जहर भरिए!’
वह जहर, जेहन में खुद ब खुद आ जायेगा और सब्जेक्ट अपने रगों में उतारने के लिए बेचैन हो जाएगा!’
‘सब्जेक्ट’ शब्द सुनकर सांपों के बदन में सुरसुरी-सी दौड़ गई।
वह धारा प्रवाह बोलता रहा,’बस हमें सपने और भय दोनों साथ-साथ दिखाने होंगे!’
अच्छे-अच्छे शब्दों के चयन पर ध्यान केंद्रित करना होगा!’ उसने चूहे की डेड बॉडी पर एक नजर मारी। फिर बोला,’देखिए! कैसे हमारे रंग में यह रंगने के लिए तैयार हो गया!’
सभी सांप चूहे के नीले बदन को देखने लगे। वे अजब रोमांच से भर उठे।
वह आगे बोला,’जहर भरिए,खूब भरिए,मगर उपदेश की शक्ल में …आप देखेंगे कि उपदेश स्वतः उन्माद में बदलता जाएगा… बस फैलकर हर जगह हमें अपना काम लगातार करते रहना है। क्या समझे!’
एक बूढ़ा सांप जोश में बोला,’ समझ गए!हमें लोकतंत्र को लोकतांत्रिक ढंग से खत्म करना है
‘बिल्कुल सही!’ सांप गर्व से बोला।
‘ये चूहा तो फंस गया,मगर क्या गारंटी है कि सभी फंसेंगे!’ दुविधा से भरे एक युवा सांप ने सवाल किया।
‘वेरी गुड क्वेश्चन!’ सांप यह बोलकर थोड़ी देर के लिये चुप हो गया। फिर फुफकारता हुआ बोला,’जब तक लोगों में वर्चस्व की भावना प्रबल रहेगी,तब तक मुझे कोई दिक्कत नहीं दीखती…’ यह सुनते ही सभी सांपों में हर्ष की लहर दौड़ गई।
‘बस वर्चस्व को उत्कर्ष की शक्ल में बेचो!’ उसने बुलन्द आवाज में यह बात कही।
पल भर में सभा जोशीले नारों से गूंज उठी और सांपों की सभा ने एकमत से उसे अपना नेता चुन लिया।
नये नवेले नेता ने बहुत प्यार से कहा,’आइए!अब हम प्रार्थना शुरू करते हैं!’
सभी सांप समवेत स्वर में प्रार्थना करने लगे।
लोकतंत्र खुद को डसवाकर हमको दूध पिलाता है, जो जितना जहरीला है, वह उतना पूजा जाता है
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