कहीं देर न हो जाए क्योंकि
जवान ठंड बूढ़ी हुई

आत्माराम त्रिपाठी की✍🏻से
जवान ठंड बुढ़ापा की तरफ अग्रसर हो गई है हल्की पछुआ की लगन सुबह शाम जिस्म में चुभन और सिहरन पैदा करती है।गुनगुनी धूप हल्का तेज हो चली है जिसमें माघ मास के अलविदा कहने व फागुन के रंगारंग मास के सुखद आगमन का आभास दे रहा है साथ गांव कस्बों,नगरो में बसंत ऋतु की आहट साफ दिखाई एंव सुनाई देने लगी है रंगों की रंगोली सजने लगी है खेतों में सरसों के ऊपर लगे पुष्प बसंती उनकी फलों के बोझ से झुक चुकी डालियां कोयल की मधुर आवाज़ भंवरों का गुंजन मनकों मोहते हुए मौसम के साक्षी बन रहें हैं।पर इस इक्कीसवीं सदी में बसंत ऋतु के आगमन से चौपालों पर ढोलक नगड़िया में थाप देने वाले लुप्त से हो गये है उनकी जगह डीजे व रिकार्डिंग के गीतों ने ले लिया है।
इस मदाकता भरे ऋतु में नाऊ ठाकुर द्वारा घोटी जा रही ठंडई की जगह आज के पेप्सी आदि अनेका अनेक ब्रांडों ने ले ली है ठडंई की जगह महुआ की कच्ची शराब ब्रांडेड दारु ने अपनी जगह बना ली है फाल्गुन के महीने में चरखी से निकाले जाने वाला रस जिसे बड़े उत्साह के साथ किसान के यहां लोग लेते थे किन्तु इस इक्कीसवीं सदी में उसका भी हास्य हो गया।
जंहा होली के गीत जगह जगह सुनाई देते थे उनकी जगह मोबाइल पर लोग डिस्को सुनने लगे हैं। हमारी संस्कृति चित्कार रही है क्योंकि चाहे जो ऋतु हो जो पर्व हो उसे आज के अधूनिक्तावादी ने अपने आगोश में ले लिया है विरासत में मिली संस्कृति लुप्त होती जा रही है धोती कुर्ता साफा की जगह बेलबाटम ने ले लिया सहनाई की जगह बैंड बाजे ने अतिक्रमण कर ली है।
किन्तु इन सब झंझावातों के बाद भी हमारी संस्कृति इस दौर में संघर्ष कर रही है य यों कहिए कि उसे हटाने के लिए आज की इक्कीसवीं सदी हटाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रही है पर कामयाब नही हो पा रही है क्योंकि यह भारत है।पर आज हमारे देस के परंपरागत आने वाले पर्वों से उनकी रौनक उनकी मिठास आत्मीयता गायब हो रहीं हैं और उनकी जगह कटुता दिखावटीपन ज्यादा नजर आने लगा है। हमने भी 58बंसत देखें जिसमें होली दशहरा उत्सव में लोग गले मिल अपने सारे शिकवे भुलाकर एक हो जाते थे।बुराई होलिका दहन में जलकर भस्म हो जाती रही बची खुची राख भी भांग ठंडई की खुमारी में रंग अबीर गुलाल के साथ सराबोर हो खत्म हो जाती रही है।पर यह पर्व अब मात्र औपचारिकता पूरी करने के माध्यम बचे हैं और हमारा यह सब लिखने का मकसद सिर्फ अपनी मूल संस्कृति की रक्षा करने व हम कल क्या थे आज क्या है हम किसके पीछे दौड़ रहे हैं इस बीच क्या खोया क्या पाया पर बिचार करने की आवश्यकता है क्योंकि कहीं देर न हो जाए।






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