युग प्रवर्तक साहित्य संस्थान द्वारा नेवटिया जी क़ी स्मृति में विश्व हिन्दी दिवस मनाया गया.
मुंबई, सांताक्रुज स्थित परम हाउस में रविवार को युग प्रवर्तक साहित्य संस्थान,मुंबई द्वारा महावीरप्रसाद अग्रवाल नेवटिया क़ी स्मृति में विश्व हिन्दी दिवस मनाया गया. इस कार्यक्रम क़ी अध्यक्षता वीरेंद्र याग्निक ने क़ी व संयोजक/संचालक पं. दिनेशचंद्र मिश्र (बैसवारी) थे. इस अवसर पर सभी ने संगीता अग्रवाल को जन्मदिन क़ी बधाई दी. कार्यक्रम में नेवटिया जी के सुपुत्र मुकुल अग्रवाल, अमोल पेडणेकर (संपादक हिन्दी विवेक) व पं. मूलचंद शुक्ल विशेष रूप से उपस्थित थे. सरस्वती वंदना शिवम बैसवारी ने पढ़ी साथ ही परिचर्चा एवं कविता पाठ में भाग लेने वालों में हौशिला अन्वेषी, बनमाली चतुर्वेदी, श्रीहरि वाणी, राम सिंह, हरीश शर्मा यमदूत, संजीव नालंदवी, रवि यादव, रामजी कनौजिया, बीएल कुंवारा, राकेश गौतम, महेश जौनपुरी, जाकिर रहबर, रमेश श्रीवास्तव, सूर्यकांत शुक्ल, नादान जी, आनंद केवल, श्रीराम शर्मा, तरुण तन्हा, सुमन तिवारी, रीना मिश्रा, कोमल, इंदु मिश्र व केडी शुक्ल आदि थे. समापन आभार मुकुल अग्रवाल ने व्यक्त किया.
उतरांव से रंगदारी मांगने के आरोप में गिरफ्तार अभियुक्त को रिमांड के लिए लाए जाने के दौरान कचहरी परिसर में जमकर बवाल हुआ। यहां कुछ लोगों ने सुरक्षा में लगे पुलिसकर्मियों को पीट दिया। बीचबचाव में दरोगा पहुंचा तो उससे भी धक्कामुक्की की गई।
सूचना पर कई थानों की फोर्स मौके पर पहुंची तब जाकर किसी तरह मुल्जिम व सिपाहियों को बाहर निकाला गया। मामले में चोटिल सिपाही की ओर से चार नामजद व अन्य अज्ञात के खिलाफ तहरीर दी गई है। हालांकि देर रात तक मुकदमा नहीं लिखा गया था।
उतरांव पुलिस ने सोमवार को दीपक तिवारी निवासी जौनपुर को गिरफ्तार किया। आरोप है कि ट्विटर पर फर्जी सूचना वायरल कर वह लोगों को डरा धमकाकर रंगदारी वसूलने का काम करता है। दोपहर बाद उतरांव थाने के एसआई अमरनाथ सिंह, एचसी दीपक तिवारी, कांस्टेबल सुभाष यादव व सुधीर कुमार उसे लेकर रिमांड के लिए कचहरी परिसर में पहुंचे।
आरोप है कि रिमांड मंजूर होने के बाद सभी उसे लेकर लौटने लगे तभी कुछ लोगों ने उन्हें घेरकर गालीगलौज शुरू कर दी। वह मुल्जिम की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे थे। गालीगलौज के विरोध पर धक्कामुक्की और फिर मारपीट शुरू कर दी गई।
इस दौरान सिपाही सुधीर चोटिल भी हो गया। जानकारी पर चौकी प्रभारी कटरा ने पहुंचकर बीचबचाव किया तो उनसे भी अभद्रता की गई। आरोप है कि मुल्जिम को छुड़ाने की भी कोशिश की गई और बचने के लिए भागने पर पुलिसकर्मियों को खदेड़ा भी गया।
बवाल की सूचना दी गई तो हड़कंप मच गया। कई थानों की फोर्स मौके पर पहुंची तब जाकर किसी तरह पुलिसकर्मियों व मुल्जिम को निकालकर कचहरी परिसर के बाहर लाया गया। सूत्रों के मुताबिक, भुक्तभोगी सिपाही की ओर से कर्नलगंज थाने में लिखित शिकायत करते हुए चार नामजद व अन्य अज्ञात के खिलाफ तहरीर दी गई है।
हालांकि देर रात तक मुकदमा नहीं दर्ज किया गया था। मामले में सीओ कर्नलगंज सुधीर कुमार से बात की गई तो उन्होंने बताया कि सिपाही से मारपीट की गई है। फिलहाल जांच पड़ताल की जा रही है।
संवादहीनता से बिगड़ी बात कचहरी में बवाल का एक कारण दो थानों की पुलिस के बीच सामंजस्य का अभाव व मामले को गंभीरता से न लेना भी रहा। दरअसल मुल्जिम की गिरफ्तारी दौरान उसके समर्थन में जुटे लोगों ने उतरांव थाने में भी पुलिसकर्मियों से नोकझोंक की थी। वहां मौजूद कुछ लोगों ने कचहरी परिसर में देख लेने की धमकी भी दी थी।
उतरांव व कर्नलगंज पुलिस ने मामले की गंभीरता को समझा होता तो मुल्जिम को रिमांड पर ले जाए जाने के दौरान अतिरिक्त सतर्कता बरती जाती जिससे शायद यह नौबत न आने पाती। लेकिन ऐसा नहीं किया गया और बात इतनी बढ़ गई। गनीमत रही कि चौकी प्रभारी कटरा ने अपनी जान पर खेलकर पिट रहे सिपाहियों को बचाया वरना मामला बेहद गंभीर हो सकता था।
उतरांव से रंगदारी मांगने के आरोप में गिरफ्तार अभियुक्त को रिमांड के लिए लाए जाने के दौरान कचहरी परिसर में जमकर बवाल हुआ। यहां कुछ लोगों ने सुरक्षा में लगे पुलिसकर्मियों को पीट दिया। बीचबचाव में दरोगा पहुंचा तो उससे भी धक्कामुक्की की गई।
Photo : प्रतीकात्मक
सूचना पर कई थानों की फोर्स मौके पर पहुंची तब जाकर किसी तरह मुल्जिम व सिपाहियों को बाहर निकाला गया। मामले में चोटिल सिपाही की ओर से चार नामजद व अन्य अज्ञात के खिलाफ तहरीर दी गई है। हालांकि देर रात तक मुकदमा नहीं लिखा गया था।
उतरांव पुलिस ने सोमवार को दीपक तिवारी निवासी जौनपुर को गिरफ्तार किया। आरोप है कि ट्विटर पर फर्जी सूचना वायरल कर वह लोगों को डरा धमकाकर रंगदारी वसूलने का काम करता है। दोपहर बाद उतरांव थाने के एसआई अमरनाथ सिंह, एचसी दीपक तिवारी, कांस्टेबल सुभाष यादव व सुधीर कुमार उसे लेकर रिमांड के लिए कचहरी परिसर में पहुंचे।
आरोप है कि रिमांड मंजूर होने के बाद सभी उसे लेकर लौटने लगे तभी कुछ लोगों ने उन्हें घेरकर गालीगलौज शुरू कर दी। वह मुल्जिम की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे थे। गालीगलौज के विरोध पर धक्कामुक्की और फिर मारपीट शुरू कर दी गई।
इस दौरान सिपाही सुधीर चोटिल भी हो गया। जानकारी पर चौकी प्रभारी कटरा ने पहुंचकर बीचबचाव किया तो उनसे भी अभद्रता की गई। आरोप है कि मुल्जिम को छुड़ाने की भी कोशिश की गई और बचने के लिए भागने पर पुलिसकर्मियों को खदेड़ा भी गया।
बवाल की सूचना दी गई तो हड़कंप मच गया। कई थानों की फोर्स मौके पर पहुंची तब जाकर किसी तरह पुलिसकर्मियों व मुल्जिम को निकालकर कचहरी परिसर के बाहर लाया गया। सूत्रों के मुताबिक, भुक्तभोगी सिपाही की ओर से कर्नलगंज थाने में लिखित शिकायत करते हुए चार नामजद व अन्य अज्ञात के खिलाफ तहरीर दी गई है।
हालांकि देर रात तक मुकदमा नहीं दर्ज किया गया था। मामले में सीओ कर्नलगंज सुधीर कुमार से बात की गई तो उन्होंने बताया कि सिपाही से मारपीट की गई है। फिलहाल जांच पड़ताल की जा रही है।
संवादहीनता से बिगड़ी बात कचहरी में बवाल का एक कारण दो थानों की पुलिस के बीच सामंजस्य का अभाव व मामले को गंभीरता से न लेना भी रहा। दरअसल मुल्जिम की गिरफ्तारी दौरान उसके समर्थन में जुटे लोगों ने उतरांव थाने में भी पुलिसकर्मियों से नोकझोंक की थी। वहां मौजूद कुछ लोगों ने कचहरी परिसर में देख लेने की धमकी भी दी थी।
उतरांव व कर्नलगंज पुलिस ने मामले की गंभीरता को समझा होता तो मुल्जिम को रिमांड पर ले जाए जाने के दौरान अतिरिक्त सतर्कता बरती जाती जिससे शायद यह नौबत न आने पाती। लेकिन ऐसा नहीं किया गया और बात इतनी बढ़ गई। गनीमत रही कि चौकी प्रभारी कटरा ने अपनी जान पर खेलकर पिट रहे सिपाहियों को बचाया वरना मामला बेहद गंभीर हो सकता था।
सड़क के किनारे कंबल बेचने वाली बुलबुल राय बनी कैंसर पीड़ित मरीजों की प्रेरणा
रिपोर्ट/रवि यादव मुंबई: भलाई और नेकी का काम करने के लिए सिर्फ पैसों की जरूरत नहीं होती। आदमी में यदि अच्छा करने का संकल्प हो तो वह जल्द ही लोगों के दिलों में अपनी जगह बना लेता है। दक्षिण मुंबई के परेल स्थित टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के पास अपने पति रतन राय के साथ कंबल बेचकर अपने परिवार का गुजारा करने वाली बुलबुल राय (38) टाटा अस्पताल में इलाज कराने आए मरीजों तथा उनके रिश्तेदारों के लिए किसी मसीहा से कम नहीं है। बचपन में कैंसर के चलते अपने पिता को खो चुकी बुलबुल राय को कैंसर मरीजों तथा उनके रिश्तेदारों की पीड़ा का पूरा अहसास है। यही कारण है कि वह निराश हो चुके कैंसर पीड़ित मरीज और उनके रिश्तेदारों का न सिर्फ हिम्मत बढ़ाती है, अपितु यथासंभव उनका सहयोग भी करती है। अन्य प्रदेशों से इलाज के लिए आये लोगों का मार्गदर्शन करती है। क्या हिंदू ; क्या मुसलमान सभी धर्मों एवं जातियों के मरीज बुलबुल राय की तारीफ करते नहीं थकते। कैंसर मरीज, बुलबुल राय को दीदी कह कर बुलाते हैं। बुलबुल राय के प्रेरणादायक कार्यों को देखते हुए समरस फाउंडेशन के चेयरमैन डॉ किशोर सिंह ने आने वाले दिनों में बुलबुल राय का संस्था कार्यालय में अभिनंदन करने का फैसला किया है। डॉ. किशोर सिंह के अनुसार- बुलबुल राय द्वारा कैंसर मरीजों तथा उनके परिजनों की जो मदद की जा रही है वह बेमिसाल है।
क्या स्त्री दासी और भोग की वस्तु है ? आत्माराम त्रिपाठी की✍🏻से आज योन उत्पीड़न रेप जैसे जघन्य मामलों में म्रत्यु दंड का प्रावधान सरकार ने रखा है तो क्या इससे समाज में बदलाव आया? हमें नहीं लगता कि इस कठोर दंड से समाज की उन विक्रति सोचो में बदलाव आया होगा जो नारी को स्त्री दासी भोग की वस्तु मात्र समझते हैं। नारी को युधिष्ठिर दांव पे लगाते हैं दुशासन चीर हरण करता है रावण हरण करता है लेकिन इसके पीछे उनकी मंशा मानसिकता नारी को नारी मानने की थी य वस्तु यह सोध का बिषय हो सकता है। जिसका उत्तर उस समय के महान आध्यात्मिक संत महात्माओं महापुरुषों ने भी नहीं दिया और आज भी यह अनुत्तरित प्रश्न है जिनका जवाब खोजा जाना चाहिए। मनुष्य मनुष्य जोखिम उठाकर ही अपराध करता है। क्या ऐसे पुरुषों को साहसी कहां जाएगा ? वह साहसी कतई नहीं है। हमने देखा है विभिन्न देशों में समय-समय पर कुछ क्रांतिकारी लोगों की भलाई के लिए समाज में समता लाने के लिए अपराध करते हैं जान का जोखिम उठाकर भी अपना काम जारी रखते हैं।तानाशाही या कुशासन का अंत होने पर वैसे इन अपराधियों को क्रांतिकारी कह कर सम्मानित किया जाता है। लेकिन मृत्युदंड का जोखिम उठाकर बलात्कार करने यौन अपराध करने या अपने स्वार्थ में किसी की जान लेने को क्रांतिकारी नहीं कह सकते यह तो जघन्य अपराध है। ऐसे अपराध संगठित रूप क्यों ले लेते हैं इसकी वजह ढूंढ कर अगर उसे निर्मूल करने की दिशा में कदम उठाए जाएं तभी बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का खात्मा किया जा सकता है। बलात्कार यौन अत्याचार और महिलाओं को परेशान करने के मूल कारण को निर्मूल किए बिना बलात्कार को रोका नहीं जा सकता । बीती सदी के आठवें दशक में बलात्कार के विरुद्ध पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेखों को देखा जाए तो नारी के प्रति लोगों की विकृति हो रही मानसिकता का पता चलता है कि कितनी घिनौनी मानसिकता हो गई है जिसके प्रति निंदा के सिवा दूसरे कोई शब्द शेष नहीं रह जाते। पहले लोगों की सोच थी की अश्लील गलत या कुरूप तथ्यों को सभी से छिपाकर रहना ही या रखना ही उचित माना जाता था। इस कारण बलात्कार की शिकार लड़कियां महिलाएं अपना मुंह बंद रखती थी। और यह निश्चय ही एक सकारात्मक बदलाव है। अगर यह मान भी लिया जाए कि मात्र दंड के भय से बलात्कार कम हो जाएंगे लेकिन पुरुष में बलात्कार की इच्छा तो रह ही जाएगी जो किसी दूसरे रूप में सामने आएगी हम जानते हैं कि पुरुषों की नारी विरोधी मानसिकता ही बलात्कार के लिए जिम्मेदार है मृत्युदंड से पूछो कि उस नारी विरोधी सोच में तो बदलाव आने से रहा जबकि उस सोच को बदलना ज्यादा जरूरी है इस सोच को बदलने के लिए जो कदम जरूरी है। क्या देश उसकी जिम्मेदारी लेगा? समाज के सभी स्थानों में इस सोच को बदलने की जिम्मेदारी सरकार के साथ-साथ गैर सरकारी संगठनों को लेनी पड़ेगी स्कूल कालेज के पाठ्यक्रम में नारी विरोध नारी अत्याचार और खतरनाक है औरत के बारे में छात्रों को सजग करना होगा दरअसल पूरूष स्वतंत्र में जो यह शिक्षा घर कर गई है कि पुरुष स्वामी और महान है जबकि स्त्री जाति और भोग की वस्तु है इस शिक्षा को खत्म किए बिना नारी विरोधी मानसिकता को बदलना संभव नहीं है। घर में दी जाने वाली शिक्षा भी बहुत महत्वपूर्ण है बालक अपने माता पिता को जिस रूप में देखता है वह भी जीवन के पर उसका नजरिया बनाता है अगर बच्चा घर में अपने पिता को मालिक और माता को राशि की भूमिकाओं में देखता है तो उसके मानस में स्त्री पुरुष की यह छबि स्थाई हो जाती है।अगर पिता उसकी मां पर अत्याचार करता है तो सिर्फ उसे ही सख्त मांग लेता है 21वीं सदी में भी क्या स्त्री को समान अधिकार नहीं मिलना चाहिए अगर उसे समान अधिकार मिलता है तो आने वाली पीढ़ी स्त्री को झांसी या संतान उत्पन्न करने की मशीन नहीं समझेगी अगर इस सदी में नारी को आर्थिक स्वतंत्रता मिलती है तो आगामी पीढ़ी स्त्री को पर निर्भर या गुलाम नहीं मानेगी। आज जरूरत है इन वजहों को खत्म करने की तभी महिलाओं पर अत्याचार खत्म होगा और यह भी कोई समाधान नहीं है कि लड़कियों के कपड़ों पर टोका टोकी करें और उन्हें अकेले रात में बाहर जाने पर प्रतिबंध लगाएं कलर या होटल में ना जाने दें बल्कि जो पुरुष अपराध करता है अंकुश तो उस पर लगाना चाहिए महिलाएं जंजीरे तोड़कर जितनी बाहर निकलेंगे बाहर की दुनिया उतनी ही उनकी अपनी होगी घर के अंदर बंद रह कर बाहर की दुनिया नहीं बदली जा सकती। मुझे तो लगता है कि जो लोग बलात्कारियों की फांसी की मांग करते हैं वह कहीं ना कहीं बलात्कार के लिए महिलाओं को ही जिम्मेदार मानते हैं अनेक प्रबुद्ध जनों को मैं जानता हूं इसलिए कह रहा हूं कि उनमें से अनेक लोग बलात्कार को अपराध नहीं मानते हैं ।पर हम यहां इस विषय पर नहीं जाना चाहते की कौन अपराध मानता है कौन नहीं ।हम केवल यह जानना चाहते हैं कि समाज नारी को किस रूप में देखता है नारी दासी भोग्या य वस्तु ? और जब तक इन्ही बिंदुओं पर चर्चा नहीं होती बदलाव नहीं आता तो सुधार की उम्मीद करना हमें बेइमानी ही लगता है। इसलिए कानून नहीं समाजिक सुरक्षा व नारी के प्रति अपनी अपनी सोच को बदलना होगा जो युगों-युगों से चली आ रही है।
वैश्विक स्वीकार्यता की ओर बढ़ती हिंदी • प्रमोद दीक्षित मलय
भाषा ही जन-जीवन में लोक व्यवहार का सहज समर्थ माध्यम होती है। भाषा के बिना व्यक्ति और समाज मूक है, पंगु है। भाषा ही भावाभिव्यक्ति का सुदृढ़ आधार एवं सबल सम्बल होती है। साहित्य साधना का ललित भव्य प्रासाद भाषा की मजबूत नींव पर ही आधृत होता है। जो भाषा शब्द-संपदा से जितनी समृद्धि होती है उसका साहित्य भी उतना ही विशाल, गम्भीर, समुन्नत और वैचारिक उच्चता से परिपूर्ण होता है। वास्तव में भाषा किसी नदी की धारा की तरह होती है जिसके तरंगित प्रवाह में एक लयात्मकता, सुमधुर संगीत और मनहरण राग समाहित होता है। भाषा क्षेत्रीय बोलियों का परिमार्जित, परिनिष्ठित एवं प्रांजल रूप होती है। भाषा के विकास और संस्कार में युगों का, पूर्वज पीढ़ियों का श्रम श्वेद घुला होता है। भाषा ही कल्पना को शब्दों का वस्त्रालंकरण प्रदान कर धरातल पर साकार करती हैं। व्यक्ति की भांति भाषा भी जीती और मरती है। भाषा का जीवनकाल इस बात पर निर्भर करता है कि सामाजिक जीवन में उसके प्रति आत्मीयता एवं आत्मगौरव का भाव है या उपेक्षा और तिरस्कार का। नई पीढ़ी के दैनंदिन जीवन में किसी भाषा का सम्मानजनक प्रयोग उस भाषा को नवल ऊष्मा और पहचान देते हुए राष्ट्र जीवन में स्थापित करता है। खुशी है कि हिंदी वैश्विक फलक पर न केवल जगमगा रही है बल्कि विश्व की युवा पीढ़ी को हिंदी सीखने के प्रति प्रेरित एवं आकर्षित भी कर रही है। और यह सभ्मव हुआ है हिंदी के समृद्ध लोकोन्मुखी साहित्य भंडार एवं विश्व हिंदी सम्मेलन के जागतिक प्रयासों से। विश्व में हिंदी के प्रचार प्रसार करने, हिंदी के प्रति अनुराग उत्पन्न करने, हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग को बढ़ावा देने एवं एक अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में विश्व में हिंदी को स्थापित करने के पावन उद्देश्य के साथ संपूर्ण विश्व में प्रत्येक वर्ष 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है। भारत के अलावा विदेशों में भारतीय दूतावासों द्वारा स्थानीय हिंदी प्रेमियों के बीच विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। उल्लेखनीय है कि पहला विश्व हिंदी सम्मेलन राष्ट्र भाषा प्रचार समिति, वर्धा के सहयोग समन्वय से 10 जनवरी 1975 को नागपुर में हुआ था जिसमें 30 देशों से शताधिक हिंदी प्रेमी प्रतिनिधियों ने सम्मिलित होकर हिंदी के प्रचार-प्रसार का संकल्प लिया था। इसलिए इस स्मृति को संजोए रखने के लिए प्रत्येक वर्ष विश्व हिंदी दिवस मना कर विश्व में हिंदी की प्रगति और स्वीकार्यता को रेखांकित कर आगामी कार्य योजनाएं एवं संकल्प लिये जाते हैं। विश्व हिंदी सम्मेलन प्रत्येक तीन वर्ष बाद मनाया जाता है। विश्व हिंदी सम्मेलन की श्रंखला में अब तक नागपुर (1975), पोर्टलुई (1976, 1993 एवं 2018), नई दिल्ली (1983), त्रिनिदाद एवं टोबैगो (1996), लंदन (1999), सूरीनाम (2003), न्यूयॉर्क (2007) जोहानसबर्ग (2012), भोपाल (2015) के प्रेरक आयोजन मील के पत्थर सिद्ध हुए हैं। 10 जनवरी, 2006 को प्रत्येक वर्ष विश्व हिंदी दिवस मनाने की घोषणा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने की थी। नार्वे स्थित भारतीय दूतावास ने सर्वप्रथम विश्व हिंदी दिवस मना कर भारत के बाहर इस परंपरा का बीजारोपण किया था। यदि हिंदी के वैश्विक विस्तार पर विचार करें तो 150 से अधिक विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी का अध्यापन किया जा रहा है। फीजी में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त है। फिजी, ट्रिनिडाड एवं टोबैगो, गुयाना, सूरीनाम, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, तिब्बत, म्यांमार, अमेरिका, कनाडा, सिंगापुर आदि देशों में हिंदी बोलने और समझने वालों की सम्मानजनक संख्या है। विभिन्न देशों से हिंदी भाषा एवं देवनागरी लिपि में दैनिक, साप्ताहिक एवं मासिक पत्र-पत्रिकाएं निकलती हैं। विश्वविद्यालयों में नवीन शोध कार्य गतिमान हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा वैश्विक आयोजनों एवं विदेशी दौरों में हिंदी में भाषण एवं संवाद करने से हिंदी का प्रभाव बढ़ा है। हिंदी सिनेमा ने भी विश्व में हिंदी के प्रसार में महतवपूर्ण योगदान दिया है। धार्मिक-सामाजिक मानवीय संस्थाओं एवं योग गुरुओं ने भी हिंदी को विदेशी धरती पर पल्लवित करने में सराहनीय भूमिका निवर्हन की है। विश्व में लगभग एक अरब लोग हिंदी बोलने-समझने वाले हैं। भारत में लगभग एक दर्जन राज्यों ने हिंदी को राजकाज की प्रथम प्रमुख भाषा स्वीकार किया है। उत्तर प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, उत्तराखंड आदि के नाम इस कड़ी में शोभायमान हैं। अन्य राज्यों यथा अरुणाचल प्रदेश, गुजरात, तिब्बत, त्रिपुरा, असम, मणिपुर, कर्नाटक, लक्षद्वीप, चंडीगढ़ आदि राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में भी हिंदी बोली-समझी जाती है। किसी भाषा के विकास पर रोजगार एवं बाजार का भी प्रभाव देखा जाता है। बाजार का अपना चाल और चरित्र होता है। वह केवल अपना हित साधना जानता है, इसलिए व्यक्ति, वस्तु और विचार को वह अपनी दृष्टि से परिभाषित एवं पोषित करता है। भाषा एवं संस्कृति की दृष्टि से बाजार नए विचार, मूल्य एवं नई भाषाएं गढ़ता और खाद-पानी देता है। तो वहीं भाषा एवं संस्कृति की जीवन रेखा को काटता भी है। इस दृष्टि से विचार करें तो हिंदी आज दुनिया के बाजार की भाषा बन गई है। भूमंडलीकरण के दौर में जब व्यापार हेतु देशीय सीमाओं के बंधन टूट गए हैं और संपूर्ण विश्व एक बाजार ही बन गया है, ऐसी स्थिति में भारत एक बड़ा बाजार एवं बड़े उपभोक्ता वर्ग के रूप में सामने आया है। यहां ग्राहकों से संपर्क एवं संबंध हिंदी भाषा में ही सहज संभव है। इसलिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने विज्ञापन एवं उत्पादों के प्रचार प्रसार में हिंदी का प्रयोग कर रही हैं। इसके साथ ही कार्मिकों के रूप में भी बड़ी संख्या में हिंदी भाषी व्यक्तियों को वरीयता दी जा रही है। एतदर्थ दुनिया में नई पीढ़ी में हिंदी सीखने के प्रति एक ललकभरा आकर्षण दिखता है। यही आकर्षण बाद में साहित्य के पठन एवं अध्ययन को प्रेरित करता है। दूसरी बात आज वैश्वीकरण के दौर में दुनिया लोगों की मुट्ठी में समा गई है। लोग भिन्न देशों, संस्कृतियों के साहित्य, खान-पान, पहनावा, रहन-सहन, परंपराओं के बारे में जानना-समझना चाहते हैं। इसके लिए वे अपनी भाषा में अनूदित पुस्तकों का सहारा लेते हैं। अनुवाद केवल शब्दों एवं वाक्यों का ही हो सकता है भावों एवं परिस्थितियों का नहीं। अतः मूल भाव के सत्वरस के साथ परमानंद प्राप्ति हेतु साहित्य प्रेमी हिंदी सीख रहे हैं। क्योंकि किसी भी भाषा का कोई भी शब्द अपने एक खास अर्थबोध एवं छवि के साथ यात्रा कर रहा होता है। यह स्थिति हिंदी के सुखद भविष्य का द्योतक हैं। विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर हम अपने दैनंदिन कार्य-व्यवहार में हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्य भाषा के रूप में दर्जा दिला सकने के संकल्प के साथ हिंदी को विश्व भाषा बनाने की ओर अग्रसर होंगे, ऐसा मुझे विश्वास है। •• लेखक भाषा शिक्षक एवं शैक्षिक संवाद मंच उ0प्र0 के संस्थापक हैं। बांदा, उ.प्र.। मोबा. 9452085234
सोशल मीडिया प्रमोटर प्रहलाद गौतम को उत्तरप्रदेश संयुक्त मीडिया क्लब का प्रदेश प्रमुख सलाहकार बनाया गया संयुक्त मीडिया क्लब के केंद्रीय अध्यक्ष राम नरेश यादव के संस्तुति पर प्रदेश अध्यक्ष मदन यादव ने आज प्रहलाद गौतम को मनोनयन पत्र प्रदान किया इस मौके पर प्रहलाद गौतम ने कहा कि वे संगठन को और मजबूत बनाने के लिए समय समय पर उचित सलाह देते रहेंगे और संगठन हित मे कार्य करेंगे, प्रहलाद गौतम उत्तर प्रदेश के 450 संपादकों के दो मीडिया समूह के एडमिन भी हैं।
एवं उत्तर प्रदेश के लगभग समस्त जिले के कई चैनल, अख़बार एवं पोर्टेल पत्रकार सम्पर्क मे रहते हैं जो कि लेटेस्ट समाचार समूह मे प्रेषित करते रहते हैं इस मौके पर प्रदेश कार्यकारिणी के राकेश कुशवाहा, राजेश कुशवाहा, पवन, मोहम्मद शाहिद, सुंदर सिंह, विनोद सोनी भी मौजूद रहे इन सबको भी मनोनयन पत्र प्रदान किया गया
रैन बसेरा में अतिक्रमणकारियों का कब्जा आत्माराम त्रिपाठी की रिपोर्ट
बांदा जिला प्रशासन जंहा रैन बसेरों को ठंड के इस मौसम में गरीबों के लिए सुरक्षित करने में सक्रिय दिखाई दे रहा है वहीं दूसरी ओर इन रैन बसेरों को दंबगो ने अपने अवैध कब्जे में ले ताला लगा उसमें अपना कब्जा जमा रखा है ऐसा ही एक मामला जनपद के अतर्रा थाना क्षेत्र कस्बा अतर्रा गौराबाबा मंदिर के पास बने रैन बसेरा का है जहां गरीबों का रैन बसेरा होना चाहिए था वहां दंबगो ने कबाड़ इकट्ठा कर ताला लगा दिया है और स्थानीय प्रशासन आंख बंद किए हुए मूकदर्शक बना देख रहा है। कस्बा निवासियों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि वह इस रैन बसेरा को अतिक्रमणकारियों के चुंगल से मुक्त कराएं।
थाना फतेहगंज जनपद बाँदा पुलिस द्वारा दस्यु प्रभावित क्षेत्रों के जंगल मे की गई कॉम्बिंग, ग्रामीणों को दिलाया सुरक्षा का भरोसा। आत्माराम त्रिपाठी की रिपोर्ट
बांदा पुलिस अधीक्षक बाँदा जे निर्देशन में अपराध तथा अपराधियों के विरुद्ध चलाये जा रहे अभियान के तहत थाना फतेहगंज पुलिस द्वारा क्षेत्रान्तर्गत के जंगल में डकैतों से भयमुक्त बना रहने के कारण वहां की जनता को सुरक्षित/महफूज महसूस करने के उद्देश्य से थाना प्रभारी फतेहगंज द्वारा भारी फ़ोर्स के साथ शांति व्यवस्था के लिए कॉम्बिंग की गई, यही नहीं आस पास के गाँव मे जा जाकर लोगो से बात कर उनसे समन्यवय स्थापित किया गया। वहां की जनता को भयमुक्त रहने तथा कोई संदिध गतिविधि होने पर पुलिस को सूचित करने की बात बताई गई।
छात्र जीवन और हॉस्टल की याद आ गयी। श्री @suryapsingh_IAS को नजरबंद किए जाने की सूचना मिलते ही रातों रात शाहजहांपुर पहुँचा, पुलिस से बचते बचाते छिप कर उनका हाल जाना और फिर बदायूँ की तरफ बढ़ रहा हूँ। ये तानाशाही के ख़िलाफ सत्याग्रह है, सरकार की मनमानी नहीं चलने देंगे। सत्यमेव जयते।
छात्र जीवन और हॉस्टल की याद आ गयी। श्री @suryapsingh_IAS को नजरबंद किए जाने की सूचना मिलते ही रातों रात शाहजहांपुर पहुँचा, पुलिस से बचते बचाते छिप कर उनका हाल जाना और फिर बदायूँ की तरफ बढ़ रहा हूँ। ये तानाशाही के ख़िलाफ सत्याग्रह है, सरकार की मनमानी नहीं चलने देंगे। सत्यमेव जयते। pic.twitter.com/fK0xXPZu4p
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