जौनपुर- शहीदों के सम्मान में रखे गये कार्यक्रम में भाजपा विधायक ने किया हंगामा, रद्द हुआ शिलान्यास कार्यक्रम @dmjaunpur की पहल पर हो रहा था शहीदों का सम्मान कार्यक्रम ,जनता में भारी रोष @myogiaditynath

*जौनपुर- शहीदों के सम्मान में रखे गये कार्यक्रम में भाजपा विधायक ने किया हंगामा,*


जौनपुर। सन् 1942 के स्वतंत्रा आन्दोलन में अपने प्राणो की आहूती देने वाले शहीदो के सम्मान में स्थापित किये गये शहीद स्मारक प्रवेश द्वार के शिलान्यास कार्यक्रम में बदलापुर के भाजपा विधायक रमेश मिश्रा ने जमकर उत्पात मचाया। उन्होने अधिकारियों से अभ्रदता करते हुए पूजन स्थल पर श्रध्दालुओ व अन्य आमंत्रित लोगो के बैठने के लिए विछाए गये गद्दे को अपने पैरो से रौद डाला। विधायक के इस तेवर से वहां पर मौजूद लोग दहल गये। विधायक की इस कारस्तानी के चलते शिलान्यास कार्यक्रम नही हो सका। लखनऊ-वाराणसी हाईवे पर स्थित जौनपुर जिले बक्शा थाना क्षेत्र के धनियांमऊ में सन् 16 अगस्त 1942 को आजादी के आन्दोलन में प्राणो की आहूति देने वाले शहीदो के सम्मान में एक स्मारक बना हुआ है, इस स्मारक स्थल का सौन्दरीकरण के लिए जिलाधिकारी दिनेश कुमार सिंह ने पहल किया। आज डीएम दिनेश कुमार सिंह ने इस कार्य का शिलान्यास करने का कार्यक्रम रखा था। कार्यक्रम के लिए बीडीओ बक्शा समेत अन्य अधिकारी कर्मचारी तैयारी पूरी करके जिलाधिकारी का इंतजार कर रहे थे,शहीदो के परिजन समेत स्थानीय नागरिक भी पहुंच चुके थे। इसी बीच स्थानीय विधायक रमेश मिश्रा लावलश्कर के साथ मौके पर पहुंचकर वहां पर मौजूद लोगो से पूछा, यहां आज क्या कार्यक्रम है, उसके बाद कड़े लहजे में पूछा बीडीओ कहा है, बीडीओ सामने आये तो उनसे तेज आवाज में कहा कि पत्थर कहा है इसी बीच तमतमाएं विधायक जी शिलान्याश के लिए बनाये गये हवन पूजन स्थल पर पहुंचकर वहां पर बिछे गद्दे को पैरो से फेकना शुरू कर दिया।विधायक के इस तेवर को देखते हुए वहां पर मौजूद अधिकारी व जनता दहल गयी। विधायक के इस कृत्य से स्थानीय जनता में आक्रोश व्याप्त हो गया है।

12 हजार पेड़ उखाड़ कर पर्यावरण संरक्षण मना रहा है कृषि विश्वविद्यालय बाँदा ।

12 हजार पेड़ उखाड़ कर पर्यावरण संरक्षण मना रहा है कृषि विश्वविद्यालय बाँदा ।




बाँदा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने दिनांक 21:12: 20 को पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम मनाया जिसके मुख्य अतिथि पर्यावरण संरक्षण गतिविधि संगठन के राष्ट्रीय संरक्षक राकेश जैन थे ।श्री जैन ने पर्यावरण संरक्षण के लिए 33% वनों की आवश्यकता पर बल दिया लेकिन शायद उन्हें विश्वविद्यालय के कुलपति के काले कारनामों की जानकारी नहीं थी । इस कार्यक्रम की महत्ता को एक कहावत चरितार्थ करती है कि *दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं* । विश्वविद्यालय द्वारा परिसर में वृक्षों को नष्ट करने के मामले में कुलपति अभी जांच के दायरे में है लेकिन *सैंया भए कोतवाल तो फिर डर काहे का* दिनांक 7 जुलाई सन 2016 को निवर्तमान कुलपति ने विश्वविद्यालय के अंदर हरित पट्टी में वन विभाग के सहयोग से 12 हजार पेड़ लगवाए गए थे तत्कालीन सरकार के निर्देशों के अनुरूप विशंभर प्रसाद निषाद सांसद राज्यसभा सहित समाजवादी पार्टी के जिला कार्यकारिणी के पदाधिकारियों ने भी इसमें भाग लिया था शासन की तरफ से इस कार्यक्रम में बांदा चित्रकूट धाम मंडल के आयुक्त वेंकटेश्वरलू सहित वन विभाग व जिले के अन्य विभागों के अधिकारियों व विश्वविद्यालय के निदेशक और शैक्षणिक व गैर शैक्षणिक कर्मचारियों ने इस कार्यक्रम को सफल बनाने में अपनी जी जान लगाई थी । जिस पर तत्कालीन सरकार के मुखिया अखिलेश यादव ने 1 दिन में पूरे उत्तर प्रदेश में 5 करोड़ वृक्ष लगाकर विश्व रिकॉर्ड बनाया था । इस विश्वविद्यालय में उन वृक्षों के देखभाल के कार्य व इसमें होने वाले तमाम खर्चों को वन विभाग ने वर्ष 2016 से वर्ष 2019 तक वहन किया था । विश्वविद्यालय अपने इस बंजर जमीन को ठीक करने के लिए अपने अन्य स्रोतों से जुलाई 2017 एवं जुलाई 2018 में भी वृक्ष लगवाए थे तथा उन वृक्षों का संवेदनशीलता से संरक्षण करता रहा । विश्वविद्यालय में सत्ता बदलते ही वृक्षों का भाग्य भी बदला।वर्तमान कुलपति डॉ यू एस गौतम ने कुलाधिपति व महामहिम राज्यपाल उत्तर प्रदेश शासन के निर्देशानुसार सूचना भेजी कि सन 2019में विश्वविद्यालय ने 19 हजार विभिन्न किस्म के पौधे विश्वविद्यालय में लगवाए लेकिन शासन तो आंकड़ों के खेल में मस्त रहा l लेकिन विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ गौतम ने शासन को अपने भयंकर दुष्चक्र की सूचना नहीं दी कुलपति द्वारा निवर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सरकार में लगवाए गए 12 हजार पौधों को जेसीबी से उखाड़ कर फिंकवा दिया जब यह खबर अखबारों और जनप्रतिनिधियों के माध्यम से उजागर हुई तो वन विभाग ने उन पौधों को ढूंढना और गिनती करना शुरू कर दिया । वन विभाग को अब तक बमुश्किल हजार पौधे भी जो सपा सरकार में लगवाए गए थे वह खोजें नहीं मिल रहे लेकिन आश्चर्य की बात है कि वन विभाग को कुलपति के खिलाफ लिखने और बोलने की हिम्मत कहां । कहते हैं कि *समरथ को नहिं दोष गुसाईं* यानी समर्थ को दोष नहीं लगता वह चाहे जितने ही अवगुण करें पर्यावरण संरक्षण के मद्देनजर विश्वविद्यालय की स्थिति बहुत ही रोचक है । विश्वविद्यालय में सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों का अक्सर भ्रमण होता है और उन्हें खुश करने के लिए हर बार वृक्ष लगवाए जाते हैं लेकिन जब विश्वविद्यालय अपने ही कबीना मंत्री सूर्य प्रताप शाही जी के द्वारा लगाए गए वृक्षों को ही नहीं बचा पाए तो और लोगों के द्वारा लगाए गए पेड़ किस खेत की मूली है । अभी पिछले दिनों भ्रमण पर आए कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही द्वारा 3 जुलाई 2020 को विश्वविद्यालय के अंदर पेड़ लगाया गया था जो नष्ट हो चुका है । यदि 2016 से अब तक लगाए गए वृक्षों की संख्या की जानकारी देखें तो उसके आधार पर अब तो विश्वविद्यालय में वृक्ष लगाने की जगह ही नहीं बचनी चाहिए । लेकिन वानिकी विभाग के विशेषज्ञों के पास तो *चिराग तले अंधेरा है* केवल आंकड़ों के लिए कुलपति द्वारा खबरें छपवा कर विश्वविद्यालय का भला नहीं हो सकता उसके लिए तो धरातल में उतर कर ही कुछ करना पड़ेगा ।स्वयं की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए कृषि उपयोगी संगोष्ठी और कार्यक्रम करना आवश्यक है ।

वंचित तबके के बीच कोरोना के बचाव को लेकर जागरूकता मुहीम चलाएगा रजत सिनर्जी फाउंडेशन: रजत पाठक. आत्माराम त्रिपाठी की रिपोर्ट

कोविड19 काल के दौरान चेंज मेकर बना रजत सिनर्जी फाउंडेशन

मेंसुरेशन हाइजीन के तहत 34 हज़ार से अधिक महिलाओं, बालिकाओं को सेनेटरी पैड का वितरण, पर्सनल हाइजीन के लिए किया जागरूक: रजत पाठक


वंचित तबके के बीच कोरोना के बचाव को लेकर जागरूकता मुहीम चलाएगा रजत सिनर्जी फाउंडेशन: रजत पाठक
आत्माराम त्रिपाठी की रिपोर्ट

लखनऊ,25 दिसंबर 2020। वैश्विक महामारी कोविड19 काल के दौरान एक ओर जहां अस्थिरता का दौर शुरू हो गया और लोग निराशा की दिशा में बढ़ चलें, वही अग्रणी सामाजिक संस्था रजत सिनर्जी फाउंडेशन अपने सेवा, सहयोग, समपर्ण के माध्यम से विविध सामाजिक बदलाव की दिशा में अग्रसर रहा और चेंज मेकर बनकर उभरा।

वर्ष 2020 की शुरूवात कोरोना संक्रमण की दस्तक के साथ शुरू हुई और मार्च के अंतिम सप्ताह में पूरा देश थम गया। ऐसे मुश्किल हालात में भी फाउंडेशन अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का पालन करने में निरन्तर जुटा रहा और लाक डाउन के दौरान भय का ऐसा माहौल बन गया कि लोगों का मनोबल गिरने लगा है, जिसका असर लोगों की प्रतिरोधक क्षमता एवं आजीविका पर भी पड़ा। ऐसे में देश के 100 प्रभुत्व जनां ने 25 भारतीय भाषाओं में करोना से बचाव के उपाय समझाते हुये अपने वीडियो संदेश रजत सिनर्जी फाउंडेशन को भेंजा। जिसे फाउंडेशन ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म द्वारा क्राउड सोर्सिंग का सफल प्रयोग करते हुए निरंतर प्रसारित कर दो मीलियन से अधिक लोगों जागरूक किया, जिसे वैश्विक स्तर पर सराहा गया। सूच्य हो कि रजत सिनर्जी फाउंडेशन सोशल मीडिया प्लेटफार्म के माध्यम से सीधे तौर पर दो मीलियन लोगों से जुड़ा है।
साथ ही सौ से अधिक परिवारों को संक्रमणसे बचाव के लिए उनके घरों का नियमित साप्ताहिक सेनेटाइजेश कराया गया।


मुख्यमंत्री योगी अदित्यनाथ के आह्वान व उत्तर प्रदेश सरकार के मिशन शक्ति अभियान प्रभावित होकर फाउंडेशन ने अपनी मुहिम ‘‘काशी के सिपाही’’ को आगे बढ़ाते हुए महिला सेवा केन्द्रित ‘‘काशी के सिपाही’’ मुहिम जो वाराणसी जनपद में अब तक की सबसे बड़ी एवं महत्वाकांक्षी मुहिम है। जिसके तहत मेंसुरेशन हाईजीन के लिए कार्य करते हुए इस मुहिम का लाभ निर्धारित लक्ष्य 30हजार महिलाओं से अधिक लगभग 34हजार तक पहुंचाया जा चुका है। साथ ही सराय डांगरी क्षेत्र की 200 से अधिक आदिवासी एवं मलिन महिलाओं में कम्बल वितरित किया गया।

रजत सिनर्जी फाउंडेशन ने चेंज मेकर बनकर अर्थ दण्ड के बदले सजा काट रहे कैदियों को रिहा कराकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की पहल की शुरूवात की। जिला कारागार में महज हजार रूपये के अर्थ दण्ड के बदले सजा काट रहे छः कैदियों कैदियों के इस आश्वासन के साथ कि वो ईमानदारी और मेहनत के साथ अपनी नई पहचान बनाएगें और शुरू हुई एक मुहिम और कारवां बनता गया। देश के कई अन्य शहरों से स्वयंसेवी संस्थाएं, लीगल फर्म व एडवोकेट्स ने सहयोग के लिये कदम बढ़ाया और इस मुहिम का हिस्सा बनकर मुहिम को बल प्रदान किया।

भाजपाइयों ने अपने-अपने बूथों में अपने प्रिय नेता अटल जी की जयंती पर उनके चित्र पर माल्यार्पण व पुष्प अर्पित करते हुए उन्हें याद किया।

बांदा 26 दिसंबर
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई की जयंती को सुशासन दिवस के रूप में मनाते हुए 26 व 27 दिसंबर को प्रत्येक बूथ में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों के अंतर्गत आज भाजपाइयों ने अपने-अपने बूथों में अपने प्रिय नेता अटल जी की जयंती पर उनके चित्र पर माल्यार्पण व पुष्प अर्पित करते हुए उन्हें याद किया।


पंडित दीनदयाल धाम जिला भाजपा कार्यालय बांदा दक्षिणी मंडल अंतर्गत बूथ नंबर 82 में जिला अध्यक्ष रामकेश निषाद के नेतृत्व में भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा अटल जी के चित्र पर माल्यार्पण व पुष्प अर्पित करते हुए उन्हें नमन किया गया। भाजपा जिला अध्यक्ष निषाद ने इस अवसर पर कहा कि अटल जी के विचारों और देश की प्रगति के लिए उनका समर्पण हमें सदैव राष्ट्र सेवा के लिए शक्ति देता रहेगा। विचारधारा, सिद्धांतों पर आधारित राजनीति एवं राष्ट्र समर्पित जीवन के साथ राष्ट्र को परम वैभव तक ले जाने का स्वप्न लेकर राष्ट्र विकास, गरीब कल्याण और सुशासन के युग की शुरुआत करने वाले भारत रत्न अटल जी को आज पूरा राष्ट्र नमन कर रहा है। अटल जी की कर्तव्यनिष्ठा व राष्ट्र सेवा हम सभी पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए सदैव प्रेरणा का केंद्र रहेगी। हम सबके प्रिय अटल जी करोड़ो कार्यकर्ताओं के दिलों में दिए की लौ की तरह विद्यमान है।
इस अवसर पर जिला महामंत्री संजय सिंह, कालू सिंह राजपूत, जिला उपाध्यक्ष कमलेश अवस्थी, बूथ अध्यक्ष मनोज धुरिया, सेक्टर संयोजक विष्णु, विवेक त्रिपाठी तथा बुद्ध राज सिंह प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

कंहा गुम हो गए ओ दिनआत्माराम त्रिपाठी की रिपोर्ट

कंहा गुम हो गए ओ दिन
आत्माराम त्रिपाठी की रिपोर्ट
बांदा एक समय था जब गाँवो में लोग सर्दियों के मौसम में अलाव (कौड़ा) में बैठकर किस्से-कहानियों का दौर चला करता था, पहले इतनी आधुनिकता नही थी ,


पहले मोबाइल, टीवी नहीं था, तब इन अलावों (कौड़ा) के आसपास खूब भीड़ रहती थी, अब तो सब रजाई में बैठकर फोन चलाते रहते हैं, किसको फुर्सत है कहानी सुनने की।आज से पांच छह साल पहले जबतक मोबाईल जैसे उपकरणों की भरमार नहीं थी तब ग्रामीण क्षेत्रों में सर्दी के मौसम में ये अलाव (कौड़ा) ही मनोरंजन का माध्यम होते थे। इन अलाव पर ठंड से बचने के साथ-साथ कभी किस्से-कहानियां तो कभी लोक संगीत और आल्हा होते। लड़ाई-झगड़े भी यहीं निपटते और एक दूसरे की मदद भी होती। ग्रामीण फसलों की चर्चा के साथ भुने आलू और शकरकंद का लुत्फ भी उठाते थे। “छह सात साल से अलाव पर किस्से कहने का सिलसिला न के बराबर बचा है। अलाव सिर्फ ठंड से नहीं बचाता था, ये मनोरंजन का भी एक माध्यम था। यहां पर पूरे मोहल्ले के गिले शिकवे मिट जाते थे । अब तो यह नजारा न के बराबर है ,
आपको बता दें हमारे देश के गांवो में अलाव(कौड़ा) वो ठिकाना होता है जिसे लोग सर्दी के मौसम में जलाते हैं। सीमित संसाधनों के बीच जीवन गुजार रहे लोगों के लिए ठंड से बचने का अलाव ही एक जरिया होता है। पर पिछले कुछ सालों में बढ़ते आधुनिकीकरण की वजह से नुक्कड़ पर जलने वाले अलाव अब दरवाजों तक सीमित हो गये हैं। अगर किसी के घर में फसल आने से पहले अनाज खत्म हो गया तो उसे खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती, अलाव पर ही बातचीत में कोई न कोई उनकी मदद के लिए तैयार हो जाता था। अब गांवों में भी पहले जैसा भाईचारा नहीं बचा है।
‘ये भारत के अन्नदाता ये कैसी बेहाली रे, सारा जग का पेट भरे तू तेरी झोली खाली रे’…

अलाव पर बैठे दादा जी ने खेती-किसानी से जुड़े ऐसे कई कई बाते बताई, गाँवो में अलाव का महत्व भी बताया कि सेहत के रखरखाव का पारंपरिक त्यौहार है मकर संक्रांति अभी भी ग्रामीण इलाको में लोग अलाव तापते हैं लेकिन पहले जैसी भीड़ नहीं रहती अपने देश में अलाव की धार्मिक मान्यताएं भी हैं। जैसे ओडिशा में अलाव जलाकर अग्नि पूर्णिमा त्योहार मनाया जाता है जो माघ पूर्णिमा के दौरान फरवरी महीने के बीच में पड़ती है। मकर संक्रान्ति से एक दिन पहले सिख समुदाय के लोग लोहड़ी मनाते हैं। पंजाब और हरियाणा जैसे प्रदेश में यह पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है, इसमें भी अलाव ही जलाये जाते हैं। लोग सूखी लकड़ियों को इकट्ठा करके पिरामिड तैयार करते हैं फिर इसकी पूजा होती है। इस अलाव में तिल के दाने के साथ मिठाई, गन्ना, चावल और फल भी डाले जाते हैं। इसके बाद लोग ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्दा करते हैं।

#Lucknow आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के खिलाफ लंबित विभागीय जांचों को 18 जनवरी तक पूरा करने के निर्देश :- (CAT) @igrangevaranasi @jaunpurpolice @amitabhthakur

लखनऊ: केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) की लखनऊ बेंच ने अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी को आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के खिलाफ लंबित विभागीय जांचों को 18 जनवरी तक पूरा करने के निर्देश दिए हैं। यह आदेश न्यायिक सदस्य मंजुला दास तथा प्रशासनिक सदस्य ए मुखोपाध्याय की बेंच ने दिया।

आईपीएस अमिताभ ठाकुर photo:- social media



कैट ने कहा कि इससे पहले पिछली 28 जनवरी को भी प्रतिवादी को 15 फ़रवरी तक जाँच पूरी करने के निर्देश दिए गए थे। इस आदेश के बाद मामले में कई बार सुनवाई हुई लेकिन प्रतिवादी द्वारा अब तक कैट के आदेशों का पालन नहीं किया गया है। कैट ने कहा कि अवस्थी एक माह में कैट के आदेशों का अनुपालन किये जाने विषयक आख्या कैट के सामने प्रस्तुत करें अन्यथा उन्हें सुनवाई की अगली तिथि 18 जनवरी को कैट के सामने उपस्थित होना पड़ेगा।

कैट ने 11 मार्च 2019 को अमिताभ के खिलाफ लंबित चार जांचों को तीन माह में समाप्त करने का आदेश दिया था जिसके बाद अवस्थी के खिलाफ अवमानना नोटिस निर्गत किया गया। अमिताभ के खिलाफ पहली जाँच 13 जुलाई 2015 को शुरू हुई थी तथा शेष तीन जांचें जुलाई 2015 से अगस्त 2016 में शुरू हुईं। अमिताभ द्वारा बार-बार अनुरोध के बाद भी ये सभी जांच अभी तक लंबित हैं।

जौनपुर/ केराकत सडक़ किनारे बीमार गाय को देख पसीजा कोतवाल विनय प्रकाश सिंह का दिल, खुद खड़े रहकर कराया इलाज। @uppolice @igrangevaranasi @jaunpurpolice @jaunpur1234

*सडक़ किनारे बीमार गाय को देख पसीजा कोतवाल का दिल, खुद खड़े रहकर कराया इलाज*

जौनपुर केराकत। पशु-पक्षी भी मानव जीवन में काफी अहमियत रखते हैं। उनका पालन-पोषण मनुष्य द्वारा ही किया जाता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो पालतु मवेशियों को पाल तो लेते हैं लेकिन कई बार बीमार पडऩे की हालत में उनकी सुध नहीं लेते। ऐसे लोगों की मानवता (Huminity) मर चुकी होती है। वहीं कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो पशु-पक्षी से काफी स्नेह करते हैं। उन्हें यदि चोट लग जाती है या बीमार पड़ जाते हैं तो वे उनके स्वास्थ्य को लेकर काफी सजग होते हैं।

केराकत कोतवाली के कोतवाल विनय प्रकाश सिंह ने मानवता की बड़ी मिसाल पेश की है। प्रतिदिन की भांति जब वह थाने से निकल कर क्षेत्र भ्रमण के लिए निकले तो थाना परिसर के समीप सडक़ किनारे घायल अवस्था में एक गाय को देखा, जो काफी बीमार भी दिख रही थी। इसके बाद उन्होंने तत्काल पशु चिकित्सक को बुलाकर मौके पर खुद १ घंटे तक खड़े होकर बीमार गाय का इलाज कराया। इसके बाद अपने सहकर्मियो को गाय के बेहतर स्वास्थ्य के लिए नियमित इलाज और देखरेख के लिए भी निर्देशित किया।

#मुम्बई समरस फाउंडेशन ने महापौर पुरस्कृत सुभाष यादव का किया अभिनंदनरिपोर्ट: रवि यादव.

समरस फाउंडेशन ने महापौर पुरस्कृत सुभाष यादव का किया अभिनंदन
रिपोर्ट रवि यादव.


मुंबई: महानगर की प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था समरस फाउंडेशन कार्यालय में आज, 21 दिसंबर को महापौर पुरस्कार से सम्मानित संस्था सदस्य श्री सुभाष चंद्रिका प्रसाद यादव का अभिनंदन किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में संस्था के संरक्षक श्री केदार ठाकुर उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि पुरस्कार प्राप्त करने पर, दायित्व और बढ़ जाता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सुभाष यादव समर्पित भावना के साथ मनपा स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब बच्चों को प्रभावशाली शिक्षा देने का काम करते रहेंगे। इस अवसर पर समरस फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. किशोर सिंह, महासचिव शिवपूजन पांडे, उपाध्यक्ष मानिकचंद यादव, विशेष सलाहकार मुख्याध्यापक सुरेंद्र पांडे, विशेष सलाहकार वरिष्ठ पत्रकार राजेश उपाध्याय समाजसेवी डॉ रईस खान तथा संस्था के विशेष सलाहकार ब्रजेश यादव उपस्थित रहे।

श्रीनिवास रामानुजन : गणित का दैदीप्यमान नक्षत्र• प्रमोद दीक्षित मलय

श्रीनिवास रामानुजन : गणित का दैदीप्यमान नक्षत्र
• प्रमोद दीक्षित मलय


लेख का आरम्भ आज से 125 साल पहले एक गांव के विद्यालय की कक्षा तीन की गणित की बेला के एक दृश्य से करता हूं। शिक्षक बच्चों से बातचीत करते हुए कहते हैं कि तीन केले यदि तीन लोगों में या एक हजार केलों को एक हजार लोगों में बराबर बांटा जाये तो प्रत्येक को एक-एक केला मिलेगा। अर्थात् किसी दी हुई संख्या में उसी संख्या से भाग देने पर भागफल एक आता है। तभी एक बच्चे ने सवाल किया कि क्या शून्य को शून्य से भाग देने पर भी भागफल एक आयेगा। कक्षा में मौन पसर गया। इस बालक ने कक्षा पांचवीं में पूरे जिले में सर्वाधिक अंक प्राप्त कर अपने माता-पिता और विद्यालय को गौरवान्वित किया। इतना ही नहीं, कक्षा सातवीं में पढ़ते हुए कक्षा बारहवीं और बी.ए. के बच्चों को गणित पढ़ाया करता था। आगे चलकर यही बालक विश्व का महान गणितज्ञ सिद्ध हुआ जिसे सभी श्रीनिवास रामानुजन आयंगर के नाम से जानते हैं और जिनके प्रमेय आधारित सूत्र गणितज्ञों के लिए आज भी रहस्य एवं अबूझ पहेली बने हुए हैं और शोधकार्य का आधार भी। वास्तव में रामानुजन गणित की दुनिया के प्रखर भास्कर थे जिनके ज्ञान, मेधा और अंक शास्त्र की समझ से विश्व चमत्कृत है। वह गणितीय कर्म कौशल के फलक का कोहिनूर माणिक्य हैं। गणित के आकाश का दैदीप्यमान नक्षत्र हैं जिनकी आभा से गणित-पथ प्रकाशित है, जिनके महनीय अवदान से गणित-कोश समृद्ध, समुन्नत और सुवासित हुआ है।
रामानुजन का जीवन-पथ कंटकाकीर्ण था। तमाम अभावों और दुश्वारियों से जूझते हुए वह गणित के शोधकार्य में मृत्युपर्यन्त साधनारत रहे। अंतिम घड़ी तक रोगशैय्या पर पेट के बल लेटे औंधे मुंह वह गणित के सूत्र रचते रहे। रामानुजन का जन्म तमिलनाडु के एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में पिता श्रीनिवास के कुल में माता कोमलतम्म्ल की कोख से 22 दिसम्बर 1887 को इरोड में हुआ था।पिता एक दूकान में मुनीम अर्थात खाता-बही लेखन का काम करते थे। एक वर्ष बाद पिता परिवार के साथ कुंभकोणम आ गये। मजेदार बात यह कि बालक तीन वर्ष तक कुछ बोला ही नहीं। सभी समझे कि वह गूंगा है। पर आगे वाणी प्रस्फुटित हुई तो परिवार में खुशी छाई। रामानुजन का बचपन कुंभकोणम में बीता और यहीं पर ही प्राथमिक शिक्षा भी पूरी हुई। आगे की शिक्षा के लिए टाउन हाईस्कूल में प्रवेश लिया। यहां पढ़ने का बेहतर वातावरण मिला। स्थूलकाय रामानुजन की आंखों में नया सीखने की उत्कट उत्कंठा की चमक थी। स्कूल के पुस्तकालय में त्रिकोणमिति आधारित सूत्रों की एक पुस्तक मिली। बालक रामानुजन उन सूत्रों को हल करने में जुटे रहते। न प्यास की चिंता न भोजन का ध्यान। सूत्रों को हल करने की ललक से रामानुजन गणितीय संक्रियाओं को समझने और हल करने में पारंगत हो गये। वह अंकों से खेलने लगे, उनके गुण-धर्मों पर सोचने लगे। पर इसके कारण अन्य विषयों के अध्ययन के लिए समय न बचता। फलत: उनमें पिछड़ते गये। लेकिन हाईस्कूल उत्तीर्ण कर लिया और गणित एवं अंग्रेजी में अधिक अंक प्राप्त करने के कारण आगे के अध्ययन के लिए सुब्रमण्यम छात्रवृत्ति मिली और कालेज में 11वीं कक्षा में दाखिला ले लिया। पर गणित में सर्वोच्च अंक लाकर अन्य विषयों में अनुत्तीर्ण हो गये। छात्रवृत्ति बंद हो गई और कालेज छूट गया। परिवार की आर्थिक स्थिति डांवाडोल और जरूरतें मुंह बाये खड़ी थीं। गणित का ट्यूशन शुरू किया तो पांच रुपये महीना मिलने लगे। 1907 में बारहवीं की परीक्षा में व्यक्तिगत परीक्षार्थी के रूप में बैठे पर फिर अनुत्तीर्ण हो गये, हालांकि गणित में पूरे अंक प्राप्त किये। परिणाम यह हुआ कि कालेज हमेशा के लिए छुट गया।
अगले पांच वर्ष जीवन की कड़ी परीक्षा का काल था। पढ़ाई छूट चुकी थी, कोई काम-धंधा था नहीं। गणित में काम करने का असीम उत्साह तरंगें मार रहा था पर किसी विद्वान शिक्षक-प्रोफेसर का साथ न था। ऐसे दुसह विकट संकटकाल में एक भाव था जो रामानुजन को अनवरत ऊर्जा प्रदान कर रहा था और वह था ईश्वर के प्रति दृढ आस्था और विश्वास। कुलदेवी नामगिरि के प्रति अनंत असीम श्रद्धा और समर्पण भाव उनके हृदय को ज्योतित किए हुए था, जिसका उल्लेख रामानुजन ने प्रो. हार्डी के साथ बातचीत में करते हुए कहा था कि गणित में शोध भी मेरे लिए ईश्वर की ही खोज है। इसी दौरान 1909 में पिता ने 12 वर्षीय कन्या जानकी से रामानुजन का विवाह करवा दिया। अब पारिवारिक जिम्मेदारियां बढ़ गईं तो आजीविका की तलाश में मद्रास(अब चैन्नै) की राह पकड़ी। पर 12वीं अनुत्तीर्ण युवक को नौकरी पर कौन रखता। जैसे-तैसे एक साल गुजरा, स्वास्थ्य भी गिरने लगा तो कुंभकोणम लौटना पड़ा। एक साल बाद फिर मद्रास लौटे। पर अबकी बार अपने गणित के शोधकार्य का रजिस्टर साथ लाये और रजिस्टर दिखाकर काम मांगने लगे। संयोग से एक शुभचिंतक ने रजिस्टर देखा तो रामानुजन को डिप्टी कलेक्टर से मिलने की सलाह दी। डिप्टी कलेक्टर वी रामास्वामी अय्यर स्वयं गणित के विद्वान थे। वह रामानुजन के काम से प्रभावित हुए और जिलाधिकारी रामचंद्र राव से अनुशंसा कर 25 रुपये मासिक मानधन का प्रबंध करवा दिया। इससे रामानुजन को आर्थिक झंझावात से आंशिक मुक्ति मिली और वे शोधकार्य में अधिक ध्यान देने लगे। इसी अवधि में वह इंडियन मैथमेटिक्स सोसायटी में काम करते हुए उसके जर्नल के लिए प्रश्न बनाने और हल करने का काम भी करने लगे थे। इसी जर्नल में आपका पहला शोध-पत्र ‘बरनौली संख्याओं का गुण’ प्रकाशित हुआ जिसकी चतुर्दिक भूरि-भूरि प्रशंसा हुई। आगे मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क के पद पर काम करने लगे। यह समयावधि रामानुजन के शोध के लिए उपयुक्त थी। रात भर स्लेट पर सूत्र बनाते, हल करते, फिर रजिस्टर पर उतारते और थोड़े आराम के बाद कार्यालय निकल जाते। एक गणितज्ञ के रूप में पहचान बनने लगी थी। मित्र की सलाह पर अपने काम को इंग्लैंड के गणितज्ञों के पास भेजा पर कोई महत्व न मिला। संयोग से 8 फरवरी 1913 को एक पत्र प्रो. जी.एच. हार्डीको भेजते हुए उनके एक अनुत्तरित प्रश्न को हल करने के सूत्र खोजने का संदर्भ देकर अपने कुछ प्रमेय भी भेजे। पहले तो हार्डी ने पत्र पर ध्यान न दिया पर अपने शिष्य लिटिलवुड से परामर्श कर रामानुजन के काम की गम्भीरता समझी और रामानुजन को मद्रास विश्वविद्यालय से छात्रवृति दिला कालांतर में शोध हेतु अपने पास लंदन बुलवा लिया। दोनों साथ शोधकार्य करते रहे। यहां रामानुजन के कई शोध-पत्र प्रकाशित हुए। ऐसे ही एक विशेष शोधकार्य पर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने बी.ए. की उपाधि प्रदान की। लेकिन वहां की जलवायु, रहन-सहन, खान-पान और सामाजिक व्यवहार से शर्मीले, संकोची, आत्मनिष्ठ शाकाहारी रामानुजन तादात्म्य न बैठा सके। स्वयं भोजन पकाने और शोधकार्य के अत्यधिक मानसिक श्रम से शरीर क्षीण होने लगा। चिकित्सकों ने क्षय रोग बता आराम करने की सलाह दी। पर रामानुजन पर काम की धुन सवार थी। इसी काल में आपको रॉयल सोसायटी का फेलो चुना गया। आज तक सबसे कम उम्र में फेलो चुने जाने वाले वह पहले व्यक्ति थे और पहले अश्वेत भी। ट्रिनिटी कालेज से फेलोशिप पाने वाले पहले भारतीय बने। रोग बढ़ने के कारण आप जन्मभूमि भारत लौट आये। मद्रास विश्वविद्यालय में प्रोफेसर नियुक्त हुए। पर स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगा। रोग शैय्या पर लेटे-लेटे ही आप काम करते। कालपाश रामानुजन के प्राणों की ओर बढ़ रहा था। 26 अप्रैल1920 को गणित का यह जगमगाता दीप अपना प्रकाश समेट अनंत की यात्रा पर निकल गया।
रामानुजन का काम आज भी गणितज्ञों की परीक्षा ले रहा है। ट्रिनिटी कालेज के पुस्तकालय में 1976 में रामानुजन का हस्तलिखित 100 पन्नों का रजिस्टर मिला था जिसमें उनकी प्रमेय और सूत्र लिखे हैं। जिसे टाटा फंडामेंटल रिसर्च सेंटर ने रामानुजन नोटबुक नाम से प्रकाशित किया है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक फिल्म ‘द मैन हू न्यू इन्फिनिटी” भी बन चुकी है। भारत सरकार ने 1912 में 125वीं जयंती के अवसर पर रामानुजन पर डाक टिकट जारी करते हुए उनके जन्मदिन 22 दिसम्बर को गणित दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की । गूगल ने डूडल बनाकर अपना श्रद्धा भाव अर्पित किया। जब तक गणित है तब तक उनकी खोज ‘रामानुजन संख्याएं’ (1729, 4104, 39312 आदि), थीटा फलन और संख्या सिद्धांत पर उनका विशेष काम विद्यार्थियों को प्रेरित करता रहेगा। रामानुजन हमेशा गणित के पृष्ठों पर विद्यमान रहेंगे।

अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह कर देयआत्माराम त्रिपाठी के साथ संतोष कुमार सोनी की रिपोर्ट

अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह कर देय

आत्माराम त्रिपाठी के साथ संतोष कुमार सोनी की रिपोर्ट
बांदा –एक ओर शासन प्रसाशन कोरोना काल के चलते जहाँ लोगों के लिये तमाम योजनायें लागू करने में प्रयासरत है वहीं दूसरी ओर सरकारी योजनाओं से सम्बँन्धित बिभागीय कर्मचारी कहीं ना कहीं अनियमितता कर रहे हैं । ऐसा ही मामला कुछ देखने को मिल रहा है न्याय पँचायत करतल के क्षेत्रीय बिद्यालयों में जहाँ ऐसी कडाके की भीषण ठँड में अभी तक लगभग 6 माह गुजर जाने के बाद सम्पूर्ण बिद्यालयों में ड्रेसों का बितरण नहीं हुआ कारण स्वयँ सहायता समूह की दीदियों को डी.एम.एम. बाँदा राकेश कुमार द्वारा अँधा बाँटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह कर देय की तर्ज पर ड्रेस सिलाई का काम दिया गया जिससे समूह की दीदियों ने कहीं कहीं गुणवत्ताविहीन खरीदी गई ड्रेसे स्कूली बच्चों को बाँटी जो बच्चों के नाप में सही नहीं आयी और कहीं कहीं अनाड़ियों द्वारा सिली ड्रेसें बितरित की गयी जिससे स्कूली बच्चे आज भी ठीक कराने के लिये भटक रहे हैं क्यों नहीं भाई इन्हे जो डी.एम.एम. साहब का आशार्वाद प्राप्त है फिर किसका डर उच्चाधिकारियों के यहाँ तो कागजी घोड़ा सरपट दौड़ रहा है ।इतना ही नहीं सूत्र बताते हैं की अभी तक स्वेटर तथा जूते भी अध्यापकों की सरपरस्ती मे आराम फरमा रहे हैं इनका भी बितरण नगण्य है जबकी सम्बँन्धित कर्मचारी आज भी लापरवाही की मिशाल कायम किये हैं।