धरती पुत्र और सरकार के मध्य बना भ्रम कब तक भ्रम बरककार रहेगा ?
आत्माराम त्रिपाठी की ✍🏻से

तीन नए कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए चल रहे किसान आंदोलन ने भारत बंद भी करा लिया बावजूद इसके समाधान के आसार नहीं दिख रहे हैं।
किसानों की मांग है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य नियम एमएसपी को कानूनी अधिकार बनाएं जिससे कोई भी ट्रेडर या खरीददार किसानों से उनके उत्पाद को कम दाम पर न खरीद पाए फिर भी कोई ऐसा करता है तो उस पर कार्रवाई हो एमएसपी और मंडियों की स्थापित व्यवस्था को खत्म होने का फायदा केवल खरीददारों को होगा जो बड़े लोग भी हो सकते हैं। इससे किसान इन्हीं के रहमों करम पर बंधुवा मजदूर शरीके मजबूर हो जाएंगे। जबकि सरकार की सफाई है कि कानून किसानों को एक खुला बाजार देता है जहां वह अपनी मनमर्जी के कृषि उत्पाद बेच सकें हालांकि सरकार का कहना है कि एमएसपी खत्म नहीं की जा रही है और मंडिया भी पहले की तरह काम करती रहेंगी। लेकिन किसान इस पर आशंकित है किसानों का दूसरा विरोध कांट्रैक्ट फार्मिंग के जरिए अनुबंध से खेती को बढ़ावा देने के लिए बने राष्ट्रीय फ्रेमवर्क पर है इसमें किसान और खरीददार के बीच समझौता होगा और किसान ट्रेडर या खरीददार को एक पूर्व निर्धारित कीमत उपज बेचेगा जिसमें कृषि उत्पाद की गुणवत्ता ग्रेड और स्टैंडर्ड भी पहले ही तय होगा इसमें नियमों के तहत फसलों की बुवाई से पहले कंपनियां किसानों का अनाज एक संविदा के तहत तैमूल्य पर खरीदने का वादा करेगी क्या उठ जाना है यह भी उसी में तय होगा साथ ही उपज बाजार की जरूरत और मांग के हिसाब से होगी मतलब कंपनियों के आगे किसान मजबूर होगा क्योंकि किसान की फसल तैयार होगी तो कंपनियां कुछ समय इंतजार करने को कहा बाद में उत्पाद को खराब बता अमान्य बता कर नया मोल भाव भी कर शकती है ।तीसरा कानून है आवश्यक वस्तु संशोधन अधिनियम यानी ईसीए इसमें अनाज दलहन तिलहन खाद्य तेल यहां तक कि प्याज और आलू टमाटर को भी आवश्यक वस्तु की सूची से हटा दिया गया किसान इसे दोधारी तलवार मान रहे हैं। क्योंकि निजी खरीददारों द्वारा इन वस्तुओं के भंडारण या जमा करने पर सरकार का नियंत्रण नहीं होगा इसमें बड़े पैमाने पर थोक खरीद या जमाखोरी के कारण जरूरी जिंसों के दाम बढ़ेंगे जिसके दो प्रतिकूल प्रभाव भी संभव है पहला ग्रामीण क्षेत्रों में महंगाई दर बढ़ेगी नतीजा गरीबी बढ़ेगी और दूसरा सरकारी राशन दुकानों के लिए खरीद की लागत बढ़ेगी आलू प्याज के आसमान छूते दाम सामने है अब किसान ही सस्ता बेच कर इन्हें महंगे दामों पर खरीदने को मजबूर है यानी गरीब एवं मध्यम वर्ग को नुकसान होने की पूर्ण संभावना है। किसानों की आशंकाएं वाजिब है भले ही यह कानून कागजों में प्रगतिशील लगी लेकिन बहुत दूर की सोच के साथ किए गए दिखते हैं निश्चित रूप में से इनसे जैसा कि किसानों का आरोप है और आंदोलन की वजह है कि उन्हें जमाखोरों व्यापारियों कार्बोरेटर मल्टीनैशनल कंपनियों के रहमों करम पर छोड़ा जा रहा है जो आखिर अन्नदाता विरोधी ही साबित होंगे।
दरअसल आंदोलन में मुख्य पेच न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी की कानूनी गारंटी को लेकर बना हुआ है एमएसपी के सवाल पर आंदोलनकारी किसान संगठन ही नहीं बल्कि संघ के अनुषांगिक संगठन भी सरकार के खिलाफ है हालांकि इस मांग से जुड़ी जटिलताओं के कारण सरकार पूरी तरह असमंजस में है अगर एमएसपी की कानूनी गारंटी की घोषणा कर दी जाए तो तीनों कानूनों को वापस लेने की मांग संबंधी स्वर धीमें हो सकते हैं। क्योंकि सरकार पहले से ही इन कानूनों के कई प्रावधानों में संशोधन के लिए तैयार मसलन सरकार किसानों को सीधे अदालत का दरवाजा खटखटाने या एनएसआर क्षेत्र से जुड़े नए प्रदूषण कानून में बदलाव करने निजी खरीददारों के लिए पंजीयन अनिवार्य करने और छोटे किसानों के हितों की रक्षा के प्रावधानों में जरूरी बदलाव के लिए तैयार है।
आजादी के बाद से ही सरकारें किसान और ग्राहकों के बीच सीधा संबंध स्थापित करने में नाकाम रही है इसके कारण ग्राहकों को तो ज्यादा कीमत चुकानी पड़ी मगर ग्राहक के द्वारा चुकाई गई रकम का मामूली हिस्सा ही किसानों की जेब तक पहुंचा मसलन ग्राहकों ने कई बार किसान द्वारा भेजी गई रकम से 4 से 5 गुना अधिक कीमत चुकाई कृषि क्षेत्र का मुनाफा बिचौलियों की भेंट चढ़ता रहा आजादी के 7 दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद सरकारें किसानों को आगे बढ़ाने में नाकाम रही सरकार का उद्देश्य कृषि क्षेत्र में निजी भागीदारी बढ़ाने की है एमएसपी को सरकार कानूनी तो बना देगी मगर निजी क्षेत्र को खरीदारी के लिए बात नहीं कर पाएगी ऐसे में अगर फसल की मांग कम हुई खरीदारी करेंगे ही नहीं सरकार एक सीमा तक ही एमएसपी के तहत खरीदारी कर सकती है सरकार औसतन कुल उपज का छह फीसदी की ही खरीदी करती है वर्तमान व्यवस्था सहित कई ऐसे कारण है जिसके चलते सरकार बहुत अधिक मात्रा में अनाज नहीं खरीदी किसी एक फसल की अधिक उपज होने के बाद उसकी मांग में कमी आएगी सरकार 1 सीमा से अधिक नहीं खरीदेगी इसके बाद एमएसपी से कम कीमत पर खरीद गैरकानूनी होने पर निजी क्षेत्र खरीदारी प्रक्रिया से नहीं जुड़ेंगे ऐसे में किसानों का क्या करेगा ?बड़ा सवाल करने का भी है ! एमएसपी के दायरे में आने वाली फसलों की अलग-अलग गुणवत्ता होती है गुणवक्ता के हिसाब से एक फसल का अलग अलग अलग मानक तय करते हुए अलग-अलग एमएसपी तय करनी होगी ।मानकों पर खरा नहीं उतरने वालों का क्या होगा उसकी कोशिश थी अपनी सूझबूझ से फसलों की खेती कराएंगे जिनकी भविष्य में मांग ज्यादा होने की संभावना रहेगी।







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